ये आइडिया ला सकते हैं बदलाव

सारी कथित क्षमताओं के बाद भी देश आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने के लिए संघर्ष ही कर रहा है। हम हमारे जीडीपी को 10 से 12 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा सकते थे। फिलहाल तो हम 5 से 6 फीसदी निकाल पाने में ही खुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं। हमने एक नई सरकार चुनी, जिसने तीव्र आर्थिक वृद्धि का वादा किया था, हमने उसे जबर्दस्त बहुमत दिया और अब वही सरकार अपना पहला वर्ष पूरा करने वाली है। सत्ता में इसकी पहली वर्षगांठ पर विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से भाग रहे हैं, विश्व मीडिया की भी हमसे उम्मीद कम होती जा रही है और हमारे युवाओं को नौकरियां नज़र नहीं आ रही हैं। न तो कॉर्पोरेट सेक्टर खुश है और न किसान।
 
विभिन्न विधानसभा चुनावों के कारण सरकार के हाथ बंधे हैं और हमारी राजनीति किसी भी पूंजीवादी सुधार से नफरत के आस-पास घूम रही है इसकी वजह से सरकार भी असली जोखिम लेने की बजाय खुद को ठीक-ठाक सरकार के रूप में देखे जाने से ही खुश है। अब तो वे कह रहे हैं कि कोई बड़े सुधार नहीं होने वाले हैं। कभी-कभी तो वे यह भी पूछ लेते हैं कि वे कौन-से बड़े सुधार हैं, जिनकी लोग बातें कर रहे हैं? यहां पांच बड़े सुधार पेश हैं, जिनसे स्थिति बदलने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इनमें से प्रत्येक सुधार कुछ वक्त बाद हमें 12 फीसदी वृद्धि दर की ओर ले जा सकता है। इससे भारतीयों की प्रतिव्यक्ति आय में नाटकीय इजाफा हो सकता है। वे पांच बड़े आइडिया इस प्रकार हैं :
 
1. भारत विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (आईएसएआर) : यह हॉन्गकांग विशेष प्रशासनिक क्षेत्र पर आधारित विचार है। हॉन्गकांग चीन का हिस्सा है, लेकिन वहां स्वतंत्र न्यायपालिका, मौद्रिक नीति और नियम-कायदे हैं। भारत को नाटकीय फायदा हो सकता है, यदि हम अपने सिंगापुर, हॉन्गकांग या दुबई विकसित कर सकें। यह सीमांकित क्षेत्र होगा, जो किसी शहर से बड़ा नहीं होगा, लेकिन वहां काम करने की पूरी स्वतंत्रता होगी। आईएसएआर भारत का हिस्सा तो होंगे, लेकिन इसके अपने कानून, नियम और बॉर्डर कंट्रोल होंगे। केंद्र या राज्य सरकार की कोई राजनीतिक पार्टी इसे छू भी नहीं सकेगी। यह करने के लिए बहुत बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत होगी। हालांकि, तस्वीर बदलने वाले आईएसएआर विदेशी निवेशकों के लिए आधार बन सकता है। यदि ऐसे कदम उठाए जाएं, जिससे निवेशक सुरक्षित महसूस करें तो हम अरबों की वह राशि नहीं खोएंगे, जो अभी सिंगापुर और हॉन्गकांग की झोली में जा रही है। पूरे देश के बिज़नेस अनुकूल होने के लिए पूरा दशक लग जाएगा। हालांकि, हमारे यहां एक शहर तो ऐसा हो सकता है। आईएसएआर जीडीपी में 2 फीसदी की अतिरिक्त वृद्धि का योगदान दे सकता है। विशाखापट्‌टनम जैसा शहर ( सीमांध्र के लिए बड़ा तोहफा), गुजरात का कोई बंदरगाह या दक्षिण भारत का कोई तटवर्ती शहर इसके लिए बेहतर हो सकते हैं।
 
2. भूमि विक्रय : सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के बारे में तभी सोचती है, जब यह विनिवेश करने वाली होती है। कर्मचारियों को देखते हुए वह गड़बड़ मामला ही है और फिर वैसे भी पीएसयू उतने मूल्यवान हैं भी नहीं। हालांकि, सरकार व इसकी संस्थाओं के पास विशाल भूखंड हैं। बाजार की कीमतों और मौजूदा उपयोग को देखें तो वह अनुत्पादक ही है। 
लुिटयन्स की दिल्ली तो एक उदाहरण भर है। जहां यदि सांसदों के लिए 20 फीसदी जमीन पर वर्ल्ड क्लास कैंपस बना दिया जाए तो उनके लिए यह बेहतर स्थिति होगी। शेष जमीन नीलाम करके कर्ज का बोझ कम किया जा सकता है। इससे हर किसी को फायदा होगा। यही बात रेलवे और सेना के पास पड़ी अतिरिक्त जमीन की है। विस्तृत क्षेत्र में फैली अचल संपत्ति पूंजी का अनुत्पादक उपयोग ही कहा जाएगा। इससे वृद्धि दर में 1 फीसदी का इजाफा होगा।
 
3. रुपए की पूर्ण परिवर्तनीयता : आज सरकार रुपए की परिवर्तनीयता को नियंत्रित करती है। फिर चाहे इसकी व्यवस्था बहुत उदार ही क्यों न हो। फाइनेंस की वैश्विक दुनिया में पूंजीगत नियंत्रण को नफरत से देखा जाता है। इससे असुरक्षा, आत्मविश्वास की कमी और नियंत्रित करने की हमारी सनक जाहिर होती है। सरकार को नियंत्रित करने की जरूरत से ज्यादा ही आदत हो गई है। यदि आप पूंजी को आकर्षित करना चाहते हैं तो इसके लिए आकर्षक बनिए। यह किया तो वृद्धि दर में 1 फीसदी इजाफा होगा।
 
4. बौद्धिक संपदा और कॉपी राइट का संरक्षण : किसी भी अर्थव्यवस्था में इनोवेशन और रचनात्मकता संपत्ति के सबसे बड़े निर्माता होते हैं। किंतु उन्हें चोरी के खिलाफ संरक्षण की जरूरत होती है, जो अभी धड़ल्ले से जारी है। फिल्म उद्योग इसका जाहिर उदाहरण है। मनोरंजन उद्योग की आमदनी पिछले दो वर्षों से कम होने का एक बड़ा और उपेक्षित कारण स्मार्टफोन की गिरती कीमतें हैं। मोबाइल सुधारने की किसी भी दुकान पर नई फिल्म आसानी से उपलब्ध हो जाती है। यदि हम भारत को आर्थिक वृद्धि का इंजन बनाने के प्रति गंभीर है, तो हमें बौद्धिक संपदा को संरक्षण देना होगा। इससे वृद्धि दर में 1 फीसदी का इजाफा होगा।
 
5. उदार टैक्स नीतियां : कंपनियां कानून का पालन करते हुए अपना कर भूगतान न्यूनतम करने की कोशिश करती हैं। इसे टैक्स प्लानिंग कहा जाता है। यह कर चोरी नहीं है। अच्छी टैक्स प्लानिंग करने वाली कंपनियों के पीछे पड़ना शत्रुतापूर्ण सरकार होने का चिह्न है। हर कुछ महीनों में टैक्स फॉर्म बदलते रहते हैं, कर विभाग के अंतहीन नोटिस, जरूरत से ज्यादा नियम, ये सब बिज़नेस के पंख छांट देते हैं। ऐसा लगता है कि कर विभाग के अधिकारियों पर अधिक वसूली के लिए अत्यधिक दबाव है और यह इजाफा मौजूदा ईमानदार करदाताओं के तुलनात्मक रूप से छोटे समूह को परेशान किए जाने की कीमत पर होता है। इसकी बजाय कर की नीची दर, वृहद कर आधार और आसान, स्थिर व उदार नियम और काम करने की ऐसी शैली, जिसमें न्यूनतम दखल की संभावना हो। ऐसा किया जाए तो करदाताओं को बहुत राहत मिल जाएगी। वृद्धि दर होगी 1 फीसदी।
 
इन पांचों आइडिया पर और बहस की जरूरत है, लेकिन ये अमल में लाने लायक हैं। यह यथास्थिति बनाए रख सत्ता में जमे रहने की तुलना में जोखिमभरा है परंतु यदि आप ऐसा न कर पाए तो सत्ता में बने रहने का मतलब ही क्या है? सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि हमें भी बदलाव का स्वागत करना चाहिए और हर पूंजीवादी कदम को संदेह की निगाह से नहीं देखना चाहिए। पूंजीवाद केवल सूट-बूट वाले लोगों के लिए नहीं है। यह टी-शर्ट वाले युवाअों के लिए भी है, जिन्हें नौकरियां चाहिए। यह धोती और कॉटन साड़ी वाले ग्रामीणों के लिए भी है, जिन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है, लेकिन यह उन्हें तभी मिल सकती है जब अर्थव्यवस्था में इतना धन हो कि वह इसके लिए पैसा दे सके। हमें साहसी आर्थिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है। अब वक्त आ गया है कि देश के युवा ताल ठोंककर ऐसे बड़े सुधारों की मांग करें।
 
- चेतन भगत (अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार)

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