जबरदस्ती परोपकार कराने का जरिया बना सीएसआर

नए कंपनी कानून को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल चुकी है। इसके चलते कम से कम 500 करोड़ रुपये के नेट वर्थ और न्यूनतम 1,000 करोड़ रुपये राजस्व कमाने या 5 करोड़ रुपये से ज्यादा मुनाफा अर्जित करने वाली कंपनियों के लिए यह अनिवार्य हो जाएगा कि वे पिछले तीन वर्षों में अपने औसतन शुद्घ लाभ का 2 फीसदी कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर खर्च करें।

इस कानून में जो बुनियादी बात नजरअंदाज की गई है, वह यही कि परमार्थ का काम कारोबारी करते हैं कंपनियां नहीं। कंपनी का काम हरसंभव तरीके से अपने अंशधारकों को लाभांश देना है। परोपकार कंपनियों का नहीं वैयक्तिक कार्य है। परोपकार के लिए अरबों डॉलर माइक्रोसॉफ्ट ने नहीं बल्कि बिल गेट्स ने लगाए हैं। सीएसआर के पीछे वजह यही है कि भारतीय कारोबारी सामाजिक बदलाव के लिए अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते और संपत्ति का पुनर्वितरण संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के एजेंडे में सबसे ऊपर है, इसके कई दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।

अब कंपनियों से उनकी जेब ढीली करने के लिए कहा जाएगा और उसका हिस्सा गरीबों पर खर्च किया जाएगा। मैं देख सकता हूं कि संप्रग नेता 2014 के आम चुनाव में रैलियों को संबोधित करते हुए यही कहेंगे कि उन्होंने कैसे हजारों करोड़ रुपये सीएसआर के जरिये जुटाए। कुछ और बातें भी उतनी ही चिंताजनक हैं। एक तो यही कि जब सभी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में बड़े पैमाने पर गड़बडिय़ां होती हैं तो हम कैसे निश्चिंत हो सकते हैं कि यहां कुछ गड़बड़ नहीं होगी? ऐसे में अपेक्षित लाभार्थियों तक लाभ पहुंचने की संभावनाएं बेहद क्षीण हैं। दूसरी बात यही कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि कंपनियों द्वारा खर्च किया जा रहा धन नेताओं से जुड़े एनजीओ और ठेकेदारों या मित्रों, प्रवर्तकों के परिवारों या वरिष्ठï अधिकारियों की संस्थाओं तक नहीं पहुंचेगा?

तीसरी बात यह कि यह कानून कहता है कि सीएसआर का धन खर्च करते वक्त कंपनियों को स्थानीय इलाकों या उस क्षेत्र को तरजीह देनी होगी, जहां उनका परिचालन हो रहा है। क्या इससे क्षेत्रीय असंतुलन की तस्वीर और बदतर नहीं होगी? अधिकांश धन कुछ राज्यों में ही खर्च होगा। बिहार और पश्चिम बंगाल में कौन सीएसआर करेगा? निश्चित रूप से सीएसआर सलाहकार नई व्यवस्था में काफी रकम बनाने के लिए तैयार हैं। अक्सर भारतीय कारोबारियों की तुलना 19वीं सदी के अमेरिकी लुटेरे कारोबारियों से की जाती है, जिन्होंने अपनी राह को मजबूत बनाने के लिए तमाम तिकड़मों का सहारा लिया। मगर उन अमेरिकियों ने कई सार्वजनिक संस्थानों की बुनियाद रखी जो आज भी विद्यमान हैं-मगर कुछ भारतीय ही इस पैमाने पर अपना दावा कर सकते हैं।

मिसाल के तौर पर टाटा परिवार ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की बुनियाद रखी तो लाला श्रीराम ने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, लेडी श्रीराम कॉलेज और श्रीराम भारतीय कला केंद्र की स्थापना की। मगर यह सूची बहुत छोटी है। इसकी एक वजह तो यही है कि उदारवाद से पहले के दौर में भारतीय कारोबारियों से बड़ी सख्ती से कर लिया जाता था। उनमें से कई को तो कर अदा करने के लिए अपने शेयर तक बेचने पड़ते थे। वे कम हिस्सेदारी के साथ ही अपनी कंपनियां चलाते थे-एक वक्त ऐसी स्थिति आई कि टाटा स्टील में टाटा संस की तुलना में बिड़ला परिवार की हिस्सेदारी ज्यादा हो गई। 1980 के दशक के मध्य तक यह कमजोरी पूरी तरह उजागर हो गई, जब स्वराज पॉल ने एस्कॉट्र्स और डीसीएम पर दांव लगाया। कोई भी भारतीय कारोबारी उसे नहीं भुला सकता।

उन्होंने पहला काम यही किया कि अगर उनके पास खर्च करने के लिए धन था तो उससे उन्होंने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई। दूसरी बात यही कि अधिकांश कारोबारी खुद को पारिवारिक संपत्ति का रक्षक समझते हैं और भविष्य की पीढिय़ों के लिए उसमें और वृद्घि करना चाहते हैं। तीसरी बात यही कि भारतीय कारोबारी अभी वृद्घि के चरण से गुजर रहे हैं और वे जितना धन जुटा सकते, उसकी उन्हें जरूरत है। उनमें से कई ने तो विस्तार की योजनाओं के लिए अपने शेयर तक गिरवी रखे हुए हैं।

फिर भी कुछ कारोबाररियों ने परोपकार की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं। जिन भारतीयों ने अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा परोपकार के लिए अलग कर दिया है, उस सूची में नाम धीरे ही सही लेकिन लगातार बढ़ रहे हैं। अजीम प्रेमजी ने दो चरणों में विप्रो के 20.7 फीसदी शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को हस्तांतरित कर दिए हैं। दुबई की शोभा डेवलपर्स के प्रवर्तक पी एन सी मेनन ने ऐलान किया है कि वह अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा परोपकार के लिए दान करेंगे।

मौजूदा अनुमान के तहत यह राशि करीब 3,600 करोड़ रुपये होती है। मित्तल परिवार के भारती फाउंडेशन का कोष में डीएलएफ के सिंह परिवार और जे पी मॉर्गन की कल्पना मोरपरिया के योगदान की वजह से 200 करोड़ रुपये के लक्षित भंडार में 25 करोड़ रुपये का और इजाफा हो गया। इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी की पत्नी रोहिणी नीलेकणी ने हाल में परोपकार के लिए अपने 5,77,000 शेयर 160 करोड़ रुपये में बेचे।

परोपकार स्वाभाविक रूप से होता है, उसे जबरदस्ती नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्यवश सरकार ने नए कंपनी विधेयक में सीएसआर प्रावधान के साथ वैसा ही करने की कोशिश की है। कारोबारियों को इसे झेलना ही होगा। अर्थव्यवस्था सुस्त वृद्घि की ओर बढ़ गई है। उपभोक्ताओं का खर्च घट गया है। कारोबारियों का मुनाफा कम हो गया है और कोई नहीं जानता कि कारोबारी परिदृश्य कब सुधरेगा। देश में निवेश माहौल बुरी स्थिति में हैं और कारोबारी धारणा एकदम रसातल में है, देश को लेकर धारणा इतनी खराब हो चुकी है कि देसी कारोबारी विदेश कूच कर रहे हैं। सीएसआर लेवी बहुत बुरे वक्त में लगाई गई है। निवेश के ठिकाने के तौर पर यह देश के अनाकर्षण को और बढ़ाएगी।

 

 

- भूपेश भन्डारी

साभारः बिजनेस स्टैंडर्ड