पुण्यतिथि विशेषः एमएसपी को लेकर बीआर शिनॉय की आशंका सच साबित हुई

भारत में कृषि उत्पादों का मूल्य समर्थन एक जोखिम भरा काम है और हमें इसमें निहित खतरों से पहले ही चेत जाना चाहिए। भारत की राष्ट्रीय आय का 50 प्रतिशत कृषि से आता है। मूल्य समर्थन की नीति मूल तौर पर मूल्य समर्थित माल के उत्पादन के लिए शेष समुदाय द्वारा उत्पादकों को दिया गया अनुदान है। जिन देशों में कृषि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक छोटा क्षेत्र है, वहां पर अर्थव्यवस्था के बड़े क्षेत्र में अनुदान बहुत ही कम आकार में बांट दिया जाता है और किसानों को इसका पर्याप्त लाभ मिलता है। भारत में मामला इससे ठीक उल्टा है। अनुदान के बोझ का असर खुले बाजार में खरीद के लिए बजट की कमी और कृषि उत्पादन के भंडारण की कमी के तौर पर दिखाई देगा। जो आगे चलकर मूल्य समर्थन नीति की समाप्ति या मुद्रास्फीति का कारण बनेगा। दोनों ही मामलों में परिणाम नुकसानदेह ही हैं। अगर यह संकट एक सीजन में नहीं आया तो अगले में आ सकता है क्योंकि बेहतर समर्थन मूल्य के चलते उत्पादन बढ़ जाएगा। भारत के संदर्भ में, कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य की नीति अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीति की ओर धकेल सकती है। अमेरिका तक में, जहां कृषि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है, मूल्य समर्थन का अस्तित्व है। लेकिन यह कामयाब नहीं है। इसके कारण कृषि उत्पाद का भंडार बढ़ता ही चला गया है और एक बहुत बड़ा भाग तो बेकार चला गया। चयनात्मक मूल्य समर्थन की नीति इस समस्या का कमजोर हल होगा। फसलों के बीच अंतर द्वेष पैदा कर सकता है और कृषि उत्पादन के तरीके के साथ-साथ आर्थिक अस्थिरता के ढांचे को बिगाड़ सकता है।

आज भारत में मूल्यों की स्थिति कृषि उत्पादों को समर्थन मूल्य या घाटे की वित्तीय व्यवस्था जैसे मुद्रास्फीतिजनक उपायों के लिहाज से भी काफी जटिल है। मूल्यों में गिरावट न तो वैश्विक थी और न ही एक जैसी। कुछ बड़े उत्पादों के मूल्य तो विपरीत दिशा में जाते देखे गए हैं। अनाज, तिलहन और काली मिर्च में गिरावट सबसे ज्यादा थी। कुछ कृषि उत्पादों, जैसे चाय, कच्ची खाल और लाख, जो कि निर्यात किए जाते हैं और आयात किए जाने सामान में जूट, की कीमतों में उतना ही उछाल देखा गया जितनी गिरावट दूसरों की कीमतों में देखी गई। उत्पादकों की कीमतें या तो स्थिर थीं या औसतन कुछ ज्यादा। जीवनयापन व्यय सूचकांक (cost of living index) या तो स्थिर रहा या फिर हल्का सा गिर गया। मूल्यों के असमान उतार-चढ़ाव वाले परिदृश्य में सामान्य से मौद्रिक उपाय मामले और कीमतों के ढांचे को और उलझा सकते हैं। हो सकता है यह पहले से ही कड़े लागत ढांचे को और मुश्किल बनाकर रोजगार पर असर डाल दे। मूल्य समर्थन और घाटे की वित्त व्यवस्था व्यक्तिगत ज्यादा उत्पादन का हल नहीं हैं। न ही निर्यात की दिक्कतों का जिसका ठीकरा गुणवत्ता के सिर फोड़ा जा सकता है। न ही घरेलू लागत या विनिमय के अधिमूल्यन का। मूल्यों को लेकर जटिल होती समस्या आर्थिक तार्किकता, स्थिरता के साथ प्रगति के महत्व को रेखांकित करती है, जहां राजस्व, निवेश, मुद्रा, ब्याज दर, प्रशुल्क, विनिमय दर नीतियां परस्पर सुसंगत हों और समरस भी।

- बी.आर. शेनॉय

[दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-57 से 1960-61) में प्रकाशित यह विवरण योजना प्रारूप से संबंधित बुनियादी तर्कों को लेकर योजना आयोग (अप्रैल 1955) के एक अर्थशास्त्री दल द्वारा तैयार एक मैमोरेंडम है।]