बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री और भारत की साख

एक बार फिर भारत सरकार और उसके नीति निर्धारकों के गलत फैसले की वजह से भारत की दुनिया भर में भद्द पिटती दिख रही है। बीबीसी द्वारा बनाई गई एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म में कुप्रसिद्ध 'निर्भया बलात्कार कांड" के आरोपी के साक्षात्कार के प्रसारण को रोकने के लिए सरकारी अमला जिस प्रकार सक्रिय हुआ यदि उतनी सक्रियता, देश के अन्य "माननीयों" द्वारा गाहे बगाहे बलात्कार के कारणों के बाबत दिए जाने वाले बयानों पर अंकुश लगाने में भी दिखाई जाती तो शायद तस्वीर थोड़ी अलग होती। ये माननीय बड़े गर्व के साथ टीवी चैनलों और अखबारों में साक्षात्कार देते समय बलात्कार के कारणों का विश्लेषण करते हुए महिलाओं से संयमित व्यवहार करने, जिंस इत्यादि न पहनने, फोन व इंटरनेट का इस्तेमाल न करने, चाऊमिन आदि ना खाने सरीखे बयान देते रहते हैं। लेकिन वैश्विक पटल पर भारत देश की साख कभी कम नहीं होती! लेकिन एक अपराधी द्वारा द्वारा दिया गया ऊलूल जुलूल बयान देश की साख पर धब्बा लगा जाता है!
 
ऐसा शायद ही कभी हुआ कि किसी खाप सरपंच अथवा किसी धार्मिक/राजनैतिक संगठनों के प्रतिनिधियों के बयानों को सेंसर किया गया। लेकिन मौत की सजा पाए एक अपराधी का अपने कुकृत्य को जायज ठहराने जैसे वक्तव्य जिसकी सभ्य समाज निंदा और भर्त्सना ही करता उसपर प्रतिबंध लगाकर न केवल पूरे वाकए का महिमामंडन किया गया बल्कि दुनियाभर में अपनी नकारात्मक छवि ही बनाई गई है। गृहमंत्रालय की इस अवांछनीय व अपरिपक्कवतापूर्ण रवैये ने एक छोटी और सामान्य सी डॉक्यूमेंट्री को बड़े बहस का मुद्दा बना दिया। भारत सरकार ने जैसे ये मान लिया था कि बीबीसी को पत्र लिख देने और भारत में इसके प्रसारण पर पाबंदी लगा भर देने से दुनिया इसे नहीं देख सकेगी। हुआ भी वही डॉक्यूमेंट्री भारत छोड़ दुनिया भर में प्रसारित हुआ। 
 
शर्मनाक है कि आज भी देश का सरकारी तंत्र खामियों को ढूंढ उसका हल ढूंढने की बजाए खामियों को उजागर करने को ही प्रतिबंधित करने की मानसिकता रखता है। आखिर एक डॉक्यूमेंट्री में किसी अपराधी के किसी बयान से राष्ट्र और राष्ट्रीय गौरव को कैसे आंच आ सकती है? बताया जा रहा है कि इससे देश के समस्त पुरुषों की छवि नकारात्मक होगी। लेकिन समझ में नहीं आता कि किसी अपराधी का बयान देश के सभी पुरुषों की मानसिकता को कैसे प्रदर्शित कर सकता है? वह भी तब जबकि डॉक्यूमेंट्री निर्माता लेस्ली उडविन भी यह कह चुकी हैं कि निर्भया कांड के विरोध में हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों ने ही उन्हें फिल्म के निर्माण के लिए आकर्षित किया।
 
अब कोई बताए कि 16 दिसंबर 2012 की घटना के विरोध में क्या महिलाओं ने ही प्रदर्शन किया था? क्या पुरुषों व युवकों ने न्याय की मांग को लेकर शरीर पर लाठियां नहीं खाईं थी? जब पुरुषों का (नेतृत्व विहीन) व्यापक विरोध प्रदर्शन किसी घटना के बाबत उनके दृष्टिकोण को प्रदर्शित नहीं कर सकता तो फिर एक कुकर्मी अपराधी के बयान देश के पुरुषों की मानसिकता का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? कितना अच्छा होता कि डॉक्यूमेंट्री के बहाने सरकार व महिलावादी संगठन एक देशव्यापी जनचर्चा का अभियान छेड़ते और इस पर जगह जगह परिचर्चा कराते ताकि देश में ऐसे मुद्दे पर एक राय कायम होती। स्वाभाविक तौर पर लेस्ली इस साहसिक फिल्म के लिए बधाई की पात्र हैं। आखिर लोगों को पता तो चला कि एक रेपिस्ट सोचता क्या है? होना तो यह चाहिए था कि डॉक्युमेंट्री को बाकायदा रिलीज़ कर उस पर चर्चा हो लेकिन हो उलटा ही रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने चैनलों से कहा है कि वे फिल्म को ब्रॉ़डकास्ट न करें। बीबीसी को लीगल नोटिस भेज दिया, मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई।
 
- अविनाश चंद्र

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.