SC-ST एक्ट में संशोधन और 18ए का जुड़ना

एससी एसटी अत्याचार कानून फिर उसी दमखम के साथ लागू हो गया है जैसा सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के फैसले से पहले था। एससी एसटी अत्याचार संशोधन कानून में धारा 18-ए और जोड़ी गई है जो कहती है कि इस कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले ना जांच की जरूरत है और ना ही जांच अधिकारी को आरोपी की गिरफ्तारी से पहले किसी की इजाजत लेने की आवश्यकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 20 मार्च को इस एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए अपने फैसले में कहा था कि एससी एसटी एक्ट में किसी के खिलाफ शिकायत आने पर एसएसपी स्तर का अधिकारी पहले मामले की जांच करेगा। अगर शिकायत किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ की गई है तो सक्षम अधिकारी के संज्ञान और जांच में शिकायत सही पाने जाने ही एफआईआर दर्ज होगी। यानी कोर्ट ने पहले केस की सच्चाई पता लगाने और फिर मुकदमा दर्ज करने की बात कही थी।

कोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के आर्टिकल 21 की व्याख्या करते हुए कहा कि हमारा संविधान सभी को समानता और जीने का अधिकार देता है। लिहाजा एससी एसटी एक्ट 1989 के तहत तुरंत बिना किसी कारण के किसी की गिरफ्तारी जायज नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों की पहले जांच होनी चाहिए और शिकायत सही पाए जाने पर गिरफ्तारी। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी जांच के किसी भी व्यक्ति की आजादी छीनी नहीं जा सकती। कोर्ट ने ऐसे मामलों में गिरफ्तार अभियुक्त की अग्रिम जमानत का भी रास्ता खोल दिया था।

दरअसल इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंचे याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि आजादी के इतने साल बाद भी सरकार सभी के लिए समान कानून देने में फेल रही है। सरकार अपनी गलती मानने की बजाय कुछ वर्ग विशेष का तुष्टीकरण कर रही है। जिससे वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा मिल रहा है और नतीजा निर्दोष झेल रहे हैं। इस कानून के कारण सरकारी अफसर किसी कर्मचारी के खिलाफ विपरीत टिप्पणी करने से डरता है। उसे लगता है कि उसे कानून में फंसा दिया जाएगा। ये कानून किसी भी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को खराब करता है। इससे झूठी शिकायत और मनमानी गिरफ्तारी की छूट मिलती है। कोर्ट याचिकाकर्ता की बात से सहमत नजर आई और अपना ऐतिहासिक फैसला दिया।

कोर्ट के फैसले के बाद दलित वर्ग सड़कों पर उतर आया और दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान सात राज्यों में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। जिसमें छह लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और बड़े पैमाने पर आगजनी से सरकारी संपत्ति को कई करोड़ों का नुकसान हुआ। ताज्जुब ये है कि भारत बंद के दौरान प्रदर्शन कर रहे ज्यादातर आंदोलनकारियों को मूल मुद्दा पता ही नहीं था। उनका मानना था कि सरकार उन्हें मिल रहा आरक्षण खत्म कर रही है और इसके विरोध में वो सड़कों पर उतर आए हैं। जैसा उन्हें उनके रहबरदारों ने पढ़ाया वो वैसा ही सुन सड़कों पर उतर आए। पर हां भारत बंद से दलितों की राजनीति करने वाली पार्टियों की चल निकली और दलितों की मांग के समर्थन में केन्द्र सरकार पर दबाव बनाने लगी।

एनडीए के घटक दल भी दलितों के समर्थन में सरकार के खिलाफ बयान देने लगे। दो केन्द्रीय मंत्री लोक-जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेन्द्र कुशवाहा ने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर इस फैसले के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई।

कांग्रेस को भी बैठे बिठाए इस मुददे पर राजनीति करने का मौका मिल गया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि दलितों को समाज के सबसे निचले पाएदान पर रखना बीजेपी और संघ के डीएनए में है। राहुल ने इस मुद्दे पर कई पार्टियों के नेताओं के साथ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की और कहा कि इस कदम से दलितों पर अत्याचार और बढ़ेगा।

एससी एसटी एक्ट सन 1989 में दलितों का उत्पीड़न रोकने के लिए उनकी सुरक्षा के मकसद से बनाया गया था। बाद के दिनों में इस कानून के बेजा इस्तेमाल की खबरें आने लगी। कई मामलों में जांच के बाद पाया गया कि इस कानून को कुछ नेताओं ने अपने विरोधियों को निपटाने के लिए इस्तेमाल किया। थानों में बेहिसाब मुकदमे दर्ज होने लगे। 

इस साल 20 मार्च को इंडियन एक्सप्रेस ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों को लेकर एक हैरतअंगेज रिपोर्ट छापी। ये रिपोर्ट आइना दिखाती है कि किस तरह एससी एसटी एक्ट में केस दर्ज तो हो जाते हैं लेकिन जब उनका फैसला होता है तो असलियत कुछ और होती है। रिपोर्ट के मुताबिक 2010 से 2016 तक आईपीसी के तहत एससी के खिलाफ अपराध में 10 फीसदी और एसटी के खिलाफ छह फीसदी वृद्धि रही। इन वर्षो में अनुसूचित जाति के मामलों में लंबित मुकदमों की संख्या 78 से बढ़कर 91 फीसदी हो गई और अनुसूचित जनजाति के मामलों मे लंबित मुकदमों की संख्या 83 से बढ़कर 90 फीसदी हो गई। सन 2007-17 के बीच दलितों के खिलाफ 66 फीसदी अपराध बढ़े। पिछले दस सालों में दलित महिलाओं से बलात्कार लगभग दोगुना हो गया। जिन मामलों में ट्रायल पूरा हुआ उनमें भी आरोपियों के छूटने की दर अधिक है। इसका एकमात्र मतलब यह नहीं है कि आरोप झूठे थे? आखिर ऐसा क्या हुआ कि एससी एसटी एक्ट के तहत 2010 में सजा की दर 38 फीसदी थी जो 2016 में घटकर 10 फीसदी रह गई? इतनी गिरावट क्यों आई ? ये शोध का विषय है ।

कानून का दुरुपयोग हमारे देश में नई बात नहीं है। दहेज के मामले में आईपीसी के 498 ए का भी ऐसा ही मामला है। 498 ए में केस दर्ज होने पर पूरे परिवार को सीखचों के पीछे डाल दिया जाता था। जरा सा मनमुटाव होने पर लड़की पक्ष के लोग लड़के वालों पर दहेज लेने का आरोप जड़ देते थे। इसमें लड़की वाले जिस किसी का भी नाम दहेज मांगने के आरोप में केस में दर्ज करवाते थे वो जेल में पहुंच जाता था जहां वो फिर मां के साथ दूध पीता छोटा बच्चा ही क्यों ना हो। सुप्रीम कोर्ट के सामने जब इस विसंगति को लाया गया तो उसने इस मामले में नामजद सभी लोगों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी और पहले केस की जांच की जरूरत पर जोर दिया।

दरअसल केन्द्र की मौजूदा एनडीए सरकार जब भी लीक से हटकर कुछ करने का मन बनाती है तो नतीजे अच्छे नहीं रहते। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चर्चा गर्म थी कि मौजूदा केन्द्र सरकार आरक्षण को खत्म करने पर विचार कर रही है। संघ प्रमुख मोहन भागवत के एक दो बयान भी इन चर्चाओं का समर्थन करते नजर आए। बस आरक्षण का लाभ ले रहे लोगों को लगा कि आरक्षण खत्म हो सकता है लिहाजा बिहार चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण हो गया। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने अपने बयानों के जरिये इस पर लाख सफाई देनी चाहिए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। चुनाव से पहले जिस बीजेपी को बिहार की सत्ता का दावेदार माना जा रहा था वो नतीजों में सत्ता पाते पाते रह गई। जो नुकसान होना था वो हो चुका था।

हालांकि ये बात अब किसी से छिपी नहीं है कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार सभी जातियों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने पर विचार कर रही है। बीजेपी के ज्यादातर बड़े नेता दबे स्वर में कहते हैं कि सरकार के भीतर सभी जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़े और कमजोर तबकों को आरक्षण देने पर विचार किया जा रहा है पर ये चर्चा अभी आरंभिक स्तर पर ही है। आरक्षण पर कोई भी फैसला लेने से पहले बड़े पैमाने पर सलाह मश्वरा कर आम राय बनाई जाएगी।

इस साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केन्द्र सरकार का विधि मंत्रालय चौकन्ना हो गया था। उसे अंदेशा था कि इस फैसले का बड़े पैमाने पर विरोध हो सकता है। लेकिन विरोध सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर भी होगा इसका अंदाजा नहीं था। 

पिछले चार सालों मे केन्द्र की मोदी सरकार पर दलित विरोधी होने के आरोप अक्सर लगते रहे हैं। जुलाई 2016 में गुजरात के उना में गौरक्षा के नाम पर कुछ दलितों की पिटाई और फिर उसी साल जनवरी में हैदराबाद में दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी। इन दो घटनाओं से बीजेपी कुछ दबाव में आ गई थी। सरकार पर दलितों और गरीबों की अनदेखी के आरोप लगने लगे थे।

लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीनो राज्यों में एससी एसटी वोटर की संख्या बड़े पैमाने पर है। लिहाजा केन्द्र सरकार नहीं चाहती कि किसी तरह रिस्क लिया जाए। बिहार विधानसभा का नतीजा इसके सामने है। लिहाजा तीनों राज्यों के चुनाव से पहले सरकार ने संसद में कानून पास कर लागू कर दिया। यानी नो मोर रिस्क !

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

-फोटो क्रेडिटः पत्रिका.क़ॉम

नवीन पाल