एक दूसरे की प्रगति को सकारात्मक तरीके से लें भारत और चीन

गरीब पड़ोसी की बजाए अमीर पड़ोसी का होना हमेशा अच्छा होता है। लेकिन भारत और चीन के कम ही अर्थशास्त्री इस सिद्धांत से इत्तेफाक रखते हैं। आश्चर्यजनक ढंग से दोनों देश एक दूसरे की प्रगति को लेकर संशय की भावना रखते हैं। दोनों देशों को चाहिए कि एक दूसरे की प्रगति को सकारात्मक ढंग से लें और उसका हिस्सा बनें। उपरोक्त विचार एटलस इकोनॉमिक रिसर्च फाउंडेंशन के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. टॉम जी. पॉमर ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यदि दोनों देश यदि एक दूसरे की प्रगति में सहयोग कर उसका हिस्सा बनते हैं तो दोनों देशों की जनता भी फायदे में रहेगी।
 
डॉ. टॉम जी. पॉमर मंगलवार को हौज खास स्थित सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के सम्मेलन कक्ष में पुस्तक 'अमन, प्रेम व आजादी' का विमोचन कर रहे थें। यह अंग्रेजी पुस्तक 'पीस, लव एंड लिबर्टी' का हिंदी रुपांतरण हैं। इस मौके पर उन्होंने कहा कि दुनियाभर में युद्ध से संबंधित विभिन्न अध्ययन होते रहते हैं लेकिन दुर्भाग्य से इनमें से अधिकांश अध्ययन युद्ध की स्थिति को टालने की बजाए उसे जीतने के उद्देश्य से किए जाते हैं। इस मौके पर उन्होंने भारत, चीन, पाकिस्तान, ईराक, सीरिया, अफगानिस्तान आदि देशों में जारी प्रत्यक्ष व परोक्ष युद्धों के कारणों पर भी विस्तार पूर्वक चर्चा की। इस मौके पर सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के प्रेसिडेंट डा. पार्थ जे. शाह, आजादी.मी के संपादक अविनाश चंद्र आदि उपस्थित रहें।

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