आत्मनिर्भरता का तात्पर्य क्या चीनी वस्तुओं का बहिष्कार है!

कोरोना वायरस संक्रमण के विस्फोट जैसी स्थिति को रोकने के उद्देश्य से 12 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाऊन 4.0 की घोषणा की। इसके पूर्व पूरा देश लगभग दो महीने तक संपूर्ण लॉकडाऊन की स्थिति में रहा और इस दौरान सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियां ठप्प रहीं। सिर्फ ऐसे सेक्टर ही थोड़े बहुत सक्रिय रहें जिनमें वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की संभावनाएं थी। जैसी कि उम्मीद थी, देश में हुई अभूतपूर्व बंदी का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा जिससे उबारने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा करनी पड़ी। इसे नाम दिया गया आत्मनिर्भर भारत अभियान।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने वकतव्य में कई और महत्वपूर्ण बातें कही जिसमें वोकल फॉर लोकल और लॉ, लैंड और लेबर रिफॉर्म प्रमुख रहीं। हालांकि लॉ, लैंड और लेबर रिफॉर्म पर मेनस्ट्रीम मीडिया में अधिक चर्चा नहीं हुई। जबकि वोकल फॉर लोकल और आत्मनिर्भरता को लेकर अलग अलग प्रकार के विश्लेषणों की बाढ़ आ गई। सोशल मीडिया पर भी इसे विदेशी के बहिष्कार और स्वदेशी को अपनाने के अभियान के तौर पर वर्णित किया जाने लगा। चीन से सीमा पर जारी विवाद ने इसे विदेशी का बहिष्कार से चीनी वस्तुओं के बहिष्कार पर लाकर केंद्रीत कर दिया। जबकि प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट तौर से कहा था कि भारत की आत्मा वसुधैव कुटुंबकम वाली संस्कृति में वाश करती है और भारत जब आत्मनिर्भरता की बात करता है तो आत्मकेंद्रीत व्यवस्था की बात नहीं करता।

दरअसल, वैश्विकरण के इस दौर में आत्मकेंद्रीत होने या स्व-पर्याप्त होने की बात करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने सरीखा ही है। 90 के दशक के पूर्व और बाद का भारत इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। आत्मनिर्भरता व्यक्ति अथवा देश के लिए आपात स्थितियों से निबटने और जीवित रहने में मददगार साबित हो सकता है लेकिन दीर्घकाल की जरूरतों और प्रगति को हासिल नहीं कर सकता है। इसके लिए श्रम विभाजन व कार्य विभाजन का सिद्धांत ही कारगर होता है। श्रम विभाजन अर्थात जिस काम को जो श्रेष्ठ तरीके से न्यूनतम लागत के साथ कर सकता है उसे ही करने देना चाहिए। बाजार विशेषकर प्रतिस्पर्धा युक्त मुक्त बाजार भी इसी फलसफे पर कार्य करता है। जो उत्पादक कम से कम कीमत पर उपभोक्ताओं को अधिक से अधिक संतुष्टि प्रदान करता है वही सफल होता है। ऐसा न सिर्फ उत्पादक बल्कि उपभोक्ताओं के भी हित में होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन बातों को अधिक अच्छी तरह से समझते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर वाइब्रेंट गुजरात और फिर प्रधानमंत्री के तौर पर मेक इन इंडिया अभियान इस बात की पुष्टि करता है कि उन्हें विदेशी कंपनियों और उद्योगों से कोई बैर नहीं है। स्व-पर्याप्तता कोविड19 महामारी के पश्चात के भारत के लिए आर्थिक आत्महत्या करने के जैसा ही होगा। इसलिए दूरदर्शी प्रधानमंत्री मोदी को देश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही साथ कुछ बड़े व कड़े आर्थिक सुधार वाले फैसले लेने ही होंगे। ये कदम 90 के दशक में लिए गए कठोर सुधारात्मक कदमों के जैसे ही होने चाहिए। उन्हें फिर से पब्लिक सेक्टर कंपनियों के विनिवेश पर जोरो शोरों से जुट जाना होगा। चीन से बाहर जाने को तैयार कंपनियों को आकर्षित कर देश में निवेश के लिए तैयार करना जरूरी है लेकिन इसके साथ ही छोटे व लघु उद्योंगों को भी तमाम बंदिशों से मुक्ति दिलानी होगी।

प्रधानमंत्री को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आत्मनिर्भरता और ग्राम सर्वोदय वाले सपने को भी पूरा करना होगा और व्यवसाय करने की सुगमता (ईज ऑफ डुईंग बिजनेस) अभियान को और तेज करते हुए लाइसेंस परमिट कोटा राज वाली नीतियों का समूल समापन करना होगा। मोदी को उन गलतियों से बचना होगा जो बापू के प्रिय और करीबी जवाहरलाल नेहरू द्वारा सत्ता संभालने के बाद लघु उद्योगों को लाइसेंस, परमिट और कोटा नाम की जंजीरों में जकड़ने के रूप में किया गया था। उन्हें पीवी नरसिंहा राव के प्रधानमंत्रीत्व काल के दौरान उदारीकरण को आत्मसात कर खुली अर्थव्यवस्था वाली व्यवस्था को अपनाने के दौरान भी सारा जोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने और देसी विशेषकर लघु उद्योगों की अनदेखी करने जैसी गलती से बचना होगा।

प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रियों को सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करना होगा कि वोकल फॉर लोकल का तात्पर्य वास्तव में देसी उत्पादों का अधिकाधिक प्रयोग करना तो है लेकिन इसका तात्पर्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना बिल्कुल नहीं है। क्योंकि यदि अन्य देश भी यदि यही नीति अपना लेते हैं तो यह किसी के हित में नहीं होगा। गौरतलब है कि अमेरिका भी अमेरिका फर्स्ट की नीति को बढ़ावा दे ही रहा है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो चीन के विकल्प के तौर पर भारत आने पर विचार कर रही कंपनियों को नकारात्मक संदेश जाएगा और प्रधानमंत्री का मेक इन इंडिया प्रयास को नुकसान ही होगा।

आत्मनिर्भर भारत अभियान के अन्य महत्वपूर्ण अव्यय लॉ, लैंड और लेबर रिफॉर्म पर बात करना अति आवश्यक है। प्रधानमंत्री द्वारा देश को संबोधिक करने अगले दिन से ही विभिन्न राज्यों ने लेबर रिफॉर्म के क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों ने श्रम कानून के तहत आने वाले ऐसे तमाम गैर जरूरी कानूनों को खत्म किया जो वास्तव में रोजगार सृजन के आड़े तो आ ही रहे थे श्रमिकों का भी नुकसान कर रहे थे। कृषि के क्षेत्र में भी बड़ा सुधार करते हुए किसानों को एपीएमसी एक्ट की जंजीरों से मुक्ति दिलाते हुए उन्हें कृषि उत्पाद अपनी मर्जी की कीमत पर पूरे देश में कहीं भी बेचने की छूट दी गई। कृषि उत्पादों की होर्डिंग को अपराध की श्रेणी से बाहर करने समेत अन्य कदम भी उठाए गए। पुराने एवं गैरजरूरी कानूनों को समाप्त करने का कार्य तो मोदी सरकार द्वारा पहले से ही किये जा रहे हैं। जरूरत यह है कि सरकार सुधार के कार्यों को तेजी दे, सरकारी कंपनियों के विनिवेश कार्य को शीघ्रता प्रदान करे और अल्पकालिक सुधारों को स्थायी रूप दे।

- अविनाश चंद्र (लेखक थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी में एसोसिएट डायरेक्टर हैं)