पीके, एमएसजी और अब एआईबी रोस्ट...

देश में यूं तो वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक हमें संविधान द्वारा प्रदत्त है लेकिन समय समय पर यह बात सिद्ध होती रहती है कि उक्त संवैधानिक हक के लिए हम सरकारी नुमाइंदों के कृपा दृष्टि पर ही ज्यादा निर्भर हैं। हाल के वक्त में एक के बाद एक कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जो हमारी इस संवैधानिक आजादी पर कुठाराघात करती हैं। हमें बार बार यह याद दिलाया जाता है कि, हमें बस वही और उतना ही बोलने की आजादी है जितना कि उनको (समाज के ठेकेदारों/ मोरल पुलिस को) सही लगती है। बात चाहे आमिर खान की हालिया फिल्म पीके से जुड़ी हो, या फिर डेरा सच्चा सौदा के राम-रहीम की फिल्म एमएसजी की। हालांकि यह लेख इस श्रृंखला की अगली कड़ी यानि कि मुंबई में हुए एक कॉमेडी शो "एआईबी रोस्ट अर्थात ऑल इंडिया ब**द" पर आधारित है। नैतिकता के पहरेदारों और समाज के ठेकेदारों को सबसे पहले तो शीर्षक में शामिल शब्द "ब**द" पर आपत्ति हुई और बाद में कार्यक्रम के कंटेंट और कथित तौर पर अश्लील शब्दों के प्रयोग पर। इसके बाद न केवल इस शो के खिलाफ बल्कि इसके संचालक निर्माता निर्देशक करण जौहर, अर्जुन कपूर व रणवीर सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई। फिर क्या था? अचानक से शो लाइम लाइट में आ गया। अखबारों की सुर्खियां बनने लगा और देखते ही देखते कुछ दिनों के भीतर यूट्यूब पर यह वीडियो इतनी बार सर्च किया गया और देखा गया कि यह विश्व में सबसे अधिक देखे जाने वाले वीडियो की सूची में शुमार हो गया।
 
सोचिए, भला इससे किसका फायदा और किसका नुकसान हुआ? कुछ दिनों पहले मैंने अपने साथ काम करने वाले कुछ सहयोगियों से इस कार्यक्रम के बारे में बात की थी। आश्चर्यजनक रूप से सभी ने ऐसे किसी शो की जानकारी से इंकार किया था, लेकिन मीडिया में चर्चा का मुद्दा बनते ही सभी इसी शो के बारे में बात करने लगें। खुद को नैतिकता का पहरेदार मानने वाली कुछ संस्थाएं अगर इस कार्यक्रम से विचलित हुईं तो इसमें कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। चौंकाने वाली बात तो ये है कि यह शो विशुद्ध रूप से व्यस्कों के लिए था और इस शो में प्रवेश भी कंडिशनल था जिसके टिकट की कीमत 4 हजार रुपए थी। विरोध का एक मुद्दा यह भी था कि शो के वीडियोज यूट्यूब पर मौजूद हैं जिसे लाखों लोग देख रहे हैं। अब उन्हें कौन समझाए की यूट्यूब पर क्या क्या मौजूद नहीं है। पोर्न वीडियोज से लेकर अश्लील गाने, फिल्म सभी वहां मौजूद हैं। इसके अलावा वीडियो लिंक पर क्लिक करने पर प्ले होने से पहले कंटेंट के ऑफेंसिव और केवल व्यस्कों के लिए होने की सूचना भी आती थी। इसके बाद भी यदि लोगों को आपत्ति है तो फिर क्या कहा जा सकता है? मजे की बात ये है कि पेरिस में हुए शार्ली एब्दो पत्रिका में छपे कार्टून के बाद हुए हत्याकांड पर दुनियाभर द्वारा की गई थू-थू में हम भी शामिल थे और स्वयं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े पैरोकार साबित करने में पीछे नहीं रहे थे। अंततः हुआ वही जो कोई नहीं चाहता था। शो को बंद कर देना पड़ा और यूट्यूब से इसके वीडियोज रिमूव कर दिए गए। 
 
हालांकि ऐसे कार्यक्रमों पर इन संस्थाओं की ऐसी प्रतिक्रिया अब स्वाभाविक मानी जाने लगी है। लेकिन, सेंसर बोर्ड और राज्य सरकार में जिम्मेदार पदों पर बैठे कुछ लोगों ने इसके खिलाफ जिस तरह के बयान दिए हैं, उसका अतीत में कोई जोड़ नहीं मिलता। हो सकता है, एआईबी शो को ज्यादातर लोग सभ्य-सुसंस्कृत समाज के लायक न मानें। लेकिन गाली-गलौज की भाषा में ताकतवर लोगों का मजाक उड़ाने की परंपरा समाज के एक बड़े हिस्से में सदियों से प्रचलित रही है और सीमित संदर्भों में इसकी एक सकारात्मक भूमिका भी रही है। जिस देश ने दुनिया को कामसूत्र दिया। जो देश अजंता ऐलोरा की शिल्प कला पर नाज करता है। जहां विवाह के दौरान गाली गाए जाने को शगुन माना जाता हो, उस देश के लिए इससे शर्मनाक कोई और बात नहीं हो सकती है।   
 
आम लोगों की पहुंच से बाहर पड़ने वाले जो बेहद शक्तिशाली लोग अपनी अच्छी-बुरी छवियों के जरिए हमारे रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करते हैं, जिनका हम सीधे तौर पर कुछ बना-बिगाड़ नहीं सकते, उनके बारे में नॉन-वेज जोक्स सुनना-सुनाना आम लोगों को न सिर्फ तात्कालिक मनोरंजन देता है बल्कि उनकी कुंठा की अभिव्यक्ति बनकर समाज को कुछ राहत भी देता है। बेशक, इससे ऐसे कार्यक्रमों का औचित्य नहीं साबित होता, लेकिन यह सूत्र जरूर मिलता है कि सरकारी प्रतिबंधों के सहारे इन्हें बंद करने की कोशिश अंतत: इन्हें और ज्यादा लोकप्रिय बनाने का जरिया ही साबित होगी। ऐसी स्थिति में सरकार का ये कर्तव्य बनता है कि संविधान प्रदत वाक-अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा करे और ऐसे विरोध प्रदर्शनों से सख्ती से निबटे।  
 
 
- अविनाश चंद्र