सहकारी अथवा निजी प्रयासों से ही जलसंकट का निबटारा संभव

लातूर मे आज पानी की स्थिति इतनी भयानक है कि ट्रेन मे पानी भरकर उनकी प्यास बुझाई जा रही है। देश के कम से कम 9-10 राज्य अभूतपूर्व जल संकट से झूझ रहे हैं। मुंबई हाईकोर्ट पहले ही आईपीएल मैच जल संकट के कारण कहीं ओर कराने का आदेश दे चुका है। सूप्रीम कोर्ट भी इससे पहले केंद्र को पानी के मामले मे फटकार लगा चुका है। बुंदेलखंड और उसके आसपास के इलाकों से लोगो का पलायन जारी है। भारत की राजधानी दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है। अभी कुछ दिनों पहले ही जाट आरक्षण के मुद्दे पर गरमाई राजनीति में जब दिल्ली का पानी बंद कर दिया गया तब सारी दिल्ली त्राहिमाम कर उठी। पंजाब-हरियाणा जल बंटवारा विवाद के बीच हरियाणा दिल्ली का पानी बंद करने की धमकी दे चुका है। इस सब के बीच लोगो के मन में ये सवाल उठना लाज़मी है कि भारत सरकार का जल मंत्रालय इन सबके बीच क्या योजना बना रही है? हलांकि आम आदमी जानता है कि नतीजा कुछ नही होगा इसलिए आश्वस्त भी है और त्रस्त भी। हाल ही में जल क्षेत्र की प्रमुख परामर्शदात्री कंपनी की रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 तक भारत प्रमुख जल संकट वाला देश बन जाएगा। यानि हमारे पास समय बहुत ज्यादा नही है। विडम्बना देखिये कि विश्व की 18 फीसदी से ज्यादा आबादी भारत में निवास करती है, लेकिन विश्व के नवीकरणीय जल संसाधन का महज 4 फीसदी ही हमारे देश में है। विश्व बैंक का आंकड़ा बताता है की भारत में सालाना ताज़ा जल की उपलब्धता 761 अरब घन मीटर है जो किसी भी देश से अधिक है। लेकिन हमारे इस उपलब्ध जल का ज्यादातर भाग प्रदूषित हो चूका है जिसके कारण पानी की गंभीर किल्लत है। 

अगर हम भूजल स्तर की बात करें तो दस साल पहले जहां 30 फुट की खुदाई पर पानी मिल जाता था वहीं आज 80 फुट पर भी पानी मिलने की कोई गारंटी नही है। भूजल का स्तर 9 राज्यों में गिरते गिरते खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है। नब्बे फीसदी से ज्यादा भूजल का इन राज्यों में दोहन हो चुका है। जिस भू जल स्तर को बनने में सैकड़ों साल लगे थे उसे हमने कुछ दशकों में खत्म कर दिया है। हलाकि कुछ जगहों पर बोरिंग पर मनाही तो हुई लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और कानून का पालन सही तरीके से न होने के कारण अवैध बोरिंग आज भी जारी है। प्रतिबंधों के बाद भी धड़ाधड़ ट्यूबवेल खोदे जा रहे हैं। सरकार की एक जल नीति रिपोर्ट के मुताबिक 1947 में सालाना प्रतिव्यक्ति जल उपलब्धता 6042 घन मीटर से घटकर 2011 में मात्र 1545 घन मीटर रह गई है। देश की सिंचाई का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भूजल और नदी नहरों के जल से होता है। 

अब सवाल ये उठता है की इसका समाधान क्या है? क्या सरकार या इंद्रदेव के भरोसे या अच्छे मानसून की आस मे हाथ पर हाथ धरे बैठा जाये? हमें ये नही भूलना चाहिए कभी न कभी कुबेर का खज़ाना भी खाली होता है। पानी का भी एक दिन हश्र यही होगा। दरअसल समस्या ये है कि हम जलसंकट की बुनियादी बातों को समझ ही नहीं पा रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या ये है कि बचपन से ही पानी को हम मुफ्त और अथाह समझते हैं, ज़ी भर के इस्तेमाल करते हैं ओर बर्बाद भी करते है। क्योंकि पानी है इसली बर्बाद कर दो। सोचिए अगर पानी की जगह पेट्रोल होता तो भी क्या आप ऐसे इस्तेमाल करते। शायद नहीं क्योंकि उसके लिए हमें पैसे खर्च करने पड़ते हैं। भूजल आज से 50 साल पहले ज़मीन के नीचे पाये जाने वाले पेट्रो पदार्थ की तुलना मे कहीं अधिक ज्यादा था लेकिन आज भूजल बहुत तेज़ी से खत्म हो रहा है, जबकि पेट्रोल अभी भी चल रहा है। हालांकि अनुमान है कि 2050 के बाद वो भी खत्म हो जाएगा। धरती पर उपलब्ध पानी का मात्र 2.5 प्रतिशत ही मीठा जल है। शेष जल खारे पानी के रूप मे है। लेकिन इस पानी के कुप्रबंधन की वजह से हमें जल संकट का सामना करना पड़ता है। मान लीजिये अगर आपके मोहल्ले मे 10 प्रतिशत लोग यदि पानी का सदुपयोग करे और 90 प्रतिशत दुरुपयोग करे क्योंकि वो मुफ्त है और उसके लिए पैसा नहीं देना पढ़ रह है, ऐसे मे पानी का सदुपयोग करने वाले लोग भी हतोत्साहित होते हैं। सोंचिए अगर तालाब मे भैंस के नहलाने या नदी मे कपड़े धोने या उद्योंगो के कचरे को लेकर सख्त कानून होते तो क्या लोग ऐसा करते? शायद तब भी करते क्योंकि सरकार हर जगह निगरानी नहीं कर सकती और अगर कभी कोई पकड़ मे आता भी तो सस्ते मे छूट जाता। यानि कानून भी भ्रष्टाचार का एक तरीका बन जाता।

अब एक तरीका ये है कि सरकार ये घोषित कर दे कि 10 साल के बाद आपको अपनी पानी का प्रबंधन खुद करना है चाहें आप जैसे भी करें। सरकार सिर्फ बेसिक पानी यानि पीने लायक दे पाएगी और हो सकता है कि सरकार आपसे पानी खरीद भी ले जैसा कि दिल्ली के कुछ भवनों मे सौर ऊर्जा के मामले मे किया है। तब लोगों के सामने क्या रास्ते होंगे? या तो वे लोग उस क्षेत्र से पलायन कर लेंगे या फिर अपने पानी के प्रबंधन के लिए योजनाएं बनाएँगे। हो सकता है अगर वो खुद को असक्षम पाये तो वो किसी बाहरी एजेंसी की सेवाएँ लें। क्योंकि अपने जल स्रोतों कुओं, तालाबों या नदियों पर हम हमारा अधिकार समझेंगे, प्यास बुझाने का जरिया समझेंगे तो बेशक एक न एक दिन हम आत्मनिर्भर हो जाएंगे। पुराने वक़्त में जब देश छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था तब लोग स्वयं अपनी बावड़ियों, पोख़रों में वर्षा और भूजल का संचयन करते थें या स्थानीय नगर प्रशासन उनसे निश्चित कर लेकर के प्रबंधन करता था। लेकिन वो इकाइयां बहुत बड़ी नहीं थी और उसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी और जन प्रयास सम्मल्लित होता था। आप जयपुर, जोधपुर, मांडू और उत्तर भारत के अनेक इलाकों में ऐसी सरंचनाएं देख सकते हैं। बिहार मे आज से 30 साल पहले तक तालाबों की समृद्ध परंपरा थी। लोगों के अपने निजी कुएं हुआ करते थे। कोई सरकारी मशीनरी नहीं थी जो दूर दराज़ के इलाकों मे पानी का प्रबंधन करती। लोगों ने सहकारी भाव से इसका प्रबंधन किया, लेकिन जैसे जैसे ग्रामीण सरंचना टूटी उनकी आत्मनिर्भरता पानी पर कम होती गई। आज देश के अधिकांश इलाकों की कहानी एक जैसी है। 

मध्यप्रदेश की राजधानी से सटे इलाके देवास में आज से 15 साल पहले लोग बूँद बूँद पानी को मोहताज़ थे। वहां भी ट्रेनों से पानी की आपूर्ति हुआ करती थी। खेती की ज़मीन बंजर होती गई। मगर जब लोगो ने पानी का प्रबंधन खुद शुरू किया तो आज वही बंजर जमीन धन धान्य से लहलहा रही है। आज हर किसान के पास एक अपना तालाब है जिससे ना सिर्फ खेतो की सिंचाई होती है बल्कि भूजल इतना समृद्ध हो गया है कि हाथ से कुछ फ़ीट ही खोदने पर पानी आ जाता है। तालाब बनाने में उनके 8 से 10 लाख खर्च जरूर हुए लेकिन वो पैसे एक साल में वसूल हो गए। यहाँ पर ज्यादातर लोगों ने नीज़ि प्रयास किये है और इसका लाभ गरीब लोगों को भी मिला क्योंकि भूजल लबालब भर गया। इसी तरह मरुभूमि राजस्थान में जयपुर से 150 किमी दूर एक गांव है लापोड़िया। वहां भी यही सूखे के हालात थें। वहां के लोगों ने पानी का प्रबंधन सहकारी तरीके से मिल जुल कर किया। तीन तरह के तालाबों का निर्माण किया गया। पहले तालाब 'अन्नसागर' से खेतों को सींचने का जरिया बनाया। पीने के लिए 'फूलसागर' का निर्माण किया जबकि मवेशियों के नहाने धोने के लिए भी एक तालाब बनाया। अब ये गांव व आसपास का इलाका समृद्ध है। आसपास लवणीय रेतीली मिटटी के बीच यह गांव स्वर्ग सा प्रतीत होता है वह भी सिर्फ वहां के निवासियों की सामूहिक मेहनत और देखभाल की वजह से। इन गांव वालों ने तालाबों के साथ चेक डैम भी बनाये जिससे वर्षा का जल व्यर्थ ना बहे। इसके अलावा हर गांव वालों की छत के बारिश का पानी भूमिगत टैंकों जिन्हें स्थानीय भाषा में टाँकी बोली जाती है, उसमे सरंक्षित होता है और यह 5-6 महीने स्वच्छ जल की आपूर्ति करता है। 

ऐसी ही कहानी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वालों की भी है। पानी के संकट के चलते लोग पलायन कर रहे हैं तिस पर हर साल जंगलो में आग लगती रहती है। लेकिन एक गांव है उफ़्फ़्रेखाल जो काफी ऊंचाई पर है। वहां के लोगों ने पानी बचाने के लिए और जंगलो को आग से रोकने के लिए एक तरीका ढूंढ निकाला। वहां पहाड़ों पर सामूहिक प्रयास से हज़ारों की संख्या में छोटे बड़े गड्ढे और कहीं कहीं तालाब जैसी सरंचना जिसे खाल कहा जाता है, का निर्माण किया गया। इन तालाबों में बारिश का पानी रुक जाता है और रिस रिस कर भूजल का स्रोत बन कर एक झरने का रूप ले लेता है। दूसरी तरफ गड्ढों में पानी होने से जंगलो में आग की समस्या पर भी काबू पा लिया गया। इन गांव वालो ने नंगे हो चुके पहाड़ों पर लाखों पेड़ भी लगाईं जिसकी सुरक्षा का दायित्व भी खुद उठाया। इन तीनों सफलता की महागाथाओ में सरकार का कही कोई रोल नही था। लोगों ने सामुदायिक या सहकारी आधार पर जल का प्रबंधन किया। 

इसलिए पानी पर आत्मनिर्भरता हमे अगर फिर से लानी है तो हमे पानी के प्रबंधन मे फिर से भागीदारी करनी होगी। ऐसे बहुत से उदाहरण हमें मिल जाएंगे जहां सहकारी या निजी क्षेत्र में की गई कोशिशो से बदलाव आया है। पानी के लिए पूरी दुनिया में सिंगापुर की बहुत तारीफ़ की जाती है। वर्तमान में आवश्यक जल की उसकी जरूरत मलेशिया की एक नदी से मिलने वाले पानी से पूरी होती है। हालांकि पानी के बंटवारे को लेकर सिंगापुर और मलेशिया के बीच करार को 2060 तक चलना है फिर भी उसने अपनी निर्भरता पहले से ही मलेशिया पर से कम करके समुद्री खारेपानी को मीठा करके अपनी पानी की जरूरते पूरी करनी शुरू कर दी है। साथ ही सीवर के पानी को पुन संशोधित करके इस्तेमाल के लायक बनाते है। मलेशिया से मिलने वाले पानी की कीमत न के बराबर है लेकिन सिंगापुर सरकार पानी के प्रबंधन के लिए उनसे उचित कीमत लेती है। क्योंकि सीवर ट्रीटमेंट प्लांट या समुद्री पानी के शोधन का खर्च थोडा अधिक आता है। लेकिन इन सबके बीच इनके पानी का नुकसान या बर्बादी न के बराबर है। भारत में बारिश का पानी नदी नालों द्वारा समुद्र में बर्बाद होता है और बाकी नदियां नालों और कारखानों से। क्योंकि हमने कभी जलस्रोतों पर अपना स्वामित्व भाव रखा ही नही। अगर स्वामित्व नही तो भला कर्तव्य कैसा। इसलिए आज पानी का ये संकट पानी का उचित प्रबंधन, जो कि निजी और सामुदायिक प्रयासों से ही संभव है; की मांग कर रहा है क्योंकि जल है तो कल है।

- सिद्धार्थ झा
स्वतंत्र लेख़क और लोक सभा टीवी में कंसलटेंट हैं।