क्या हम सभ्य हो रहे हैं ?

पिछले दिनों स्टीवेन पिंकर जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल में भाग लेने आए थे जहां उन्होंने अपने भाषण में जो कहा उसका लब्बोलुबाब यह था कि आदमी अब इंसान बनता जा रहा है। भयानक हिंसक युद्ध पहले से कम हो गए हैं और इसके साथ समाज में हिंसा कम होती जा रही है। उनका यह दावा नया नहीं है। उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक – द बेटर एजिंल्स आफ अवर नेचर-व्बाय वायलेंस इज डीक्लाइंड- में भी यही दावा किया है। उससे चौंकानवाली बात यह है पिंकर इसके लिए तीन कारकों के त्रिकोण को कारणीभूत मानते हैं वे हैं –मुक्त अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और बाहरी विश्व से रिश्तें। जो लोग बुर्जुआ समृद्धी को पाने की आकांक्षा रखते हैं और मुक्त व्यापार को महत्वपूर्ण मानते हैं वे उन लोगों को मारने के प्रवृत्त नहीं होते जिनके साथ वे व्यापार कर सकते हैं। 

स्टीवन पिंकर की युद्ध और हिंसा कम होने की बात को पचा पाना थोड़ा मुश्किल ही है। खून, ह्त्या, बलात्कार ,रोडरेग, नरसंहार, गृहयुद्ध, युद्ध और आंतकवादी हमले – हर अखबार या चैनल पर इस तरह की खबरें देखने को मिल जाती हैं और इन्हें देखकर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि आदमी दिनोंदिन ज्यादा हिंसक और क्रूर होता जा रहा है। इस दुनिया में जीना मुश्किल हो गया  है। किसी बड़े बूढ़े से पूछेंगे तो कहेगा कि कलयुग है घोर कलयुग। लेकिन  इस समय में कोई आपसे यह कहे कि यह कलयुग नहीं सतयुग की शुरूआत है. दुनियां दिनोंदिन बेहतर बनती जा रही है तो आप कहेंगे कि ऐसा तो कोई पागल ही कह सकता है। लेकिन इन दिनों मंदी, पर्यावरण विभीषिका के दौर में अमेरिका और यूरोप में धड़ाधड़ ऐसी किताबें छप रही जिनमें आंकड़ों और तथ्यों के साथ यह दावा किया जा रहा है कि हकीकत वह नहीं है जो हमें नजर आ रही है। आदमी पहली बार इंसान बन रहा है। दुनियां स्वर्ग भले ही न बनी हो पहले से कहीं बेहतर हो गई है और लगातार बेहतर बनती जा रही है। अब युद्धों में पहले जितने लोग नहीं मर रहे, हत्या, बलात्कार, घरेलू हिंसा में कमी आई है। स्वास्थ्य में सुधार हुआ है इसलिए लोगों के जीवन की संभाव्यता में भारी वृद्धि हुई है। यह सब आंकड़ो और तथ्यों के आईने में अपकों दिखा दिया जाए तो आपकों मानना पड़ेगा।

इन दिनों पश्चिमी देशों में आज की दुनिया के बारे में ऐसी आशावादी तस्वीर प्रस्तुत करनेवाली पुस्तकों की बाढ़ आई हुई है। इनमें सबसे चर्चित पुस्तक है स्टीवेन पिंकर की –द बेटर एजिंल्स आफ अवर नेचर-व्बाय वायलेंस इज डीक्लाइंड। इस पुस्तक में पिंकर ने एक बहुत सनसनीखेज दावा किया है कि मध्य पूर्व में आतंकवाद, सूड़ान में नरसंहार और सोमालिया में गृहयुद्ध से कराहती 21वी सदी मानवीय इतिहास की सबसे कम हिंसक और दरिंदगी वाली सदी है। न केवल हत्याएं वरन यातना, गुलामी, घरेलू हिंसा, नफरतजन्य अपराध पहले की तरह बहुत आम नहीं रहे। हालांकि वे स्वयं मानते हैं कि उनके दावे को लोग आसानी से हजम नहीं कर सकते क्योंकि हमें हिंसा के इतने सारे उदाहरण रोज देखने को मिल जाते हैं और हमारी आंखे धोखा खा जाती हैं क्योंकि हम याद उदाहरणों के आधार पर हम संभाव्यताओं का हिसाब लगाते हैं। हमारे पास हर तरफ से हिंसा की खबरें आती हैं। और हम समझते हैं हत्या, बलात्कार, कबीलाई युद्ध और आत्मघाती हमलावर सब हमारे आसपास घूम रहे हैं।

पिंकर की यह भी दलील है कि हमने हिंसा की परिभाषा को भी विस्तार दिया है। कुछ दिनों पहले राष्ट्रपति ओबामा ने बुलिइँग की आलोचना करते हुए भाषण दिया 40 साल पहले लोगों को यह बात अजीब लगती। मृत्युदंड का विरोध, घरेलू हिंसा में पुलिस का हस्तक्षेप ये सब –महान नैतिक उपलब्धियां – हैं। लेकिन इसके साथ पिंकर यह टिप्पणी करना नहीं भूलते इनकी वजह से ही यह धारण भी बनती है कि हिंसा बहुत व्यापक तौर पर फैली हुई है। हम सोचते हैं कि हालात बिगड़ रहे हैं लेकिन असल में हमारी संवेदनशीलता बढ़ गई है और उसका दायरा व्यापक हुआ है।

अपनी दलील की सत्यता को साबित करने के लिए पिंकर आंकड़ों, तथ्यों, तालिकाओं का अंबार लगा देते हैं। थामस हाब्स के जुमले का हवाला देते हैं कि जीवन बहुत खराब, क्रूरतापूर्ण और छोटा था। आंकड़े बताते हैं कि एक आदमी के दूसरे आदमी के हाथों मारे जाने की संभावना बहुत ज्यादा यानी 60प्रतिशत तक थी। यह संभाव्यता 20वी सदी के यूरोप और अमेरिका की तुलना में 50गुना ज्यादा थी। बीसवी सदी वह सदी थी जब यूरोप में दो विश्वयुद्ध भी हुए। यदि कबीलाई युद्धों के काल की मृत्यु दर बीसवी सदी में भी होती तो दस करोड़ लोगों की मौत नहीं दो अरब लोगों की मौत होती।

जब पिंकर से यह सवाल किया जाता है कि पिछली सदी में इतनी हिंसा और युद्ध हुए ऐसे में कोई उनकी बात पर विश्वास कैसे कर सकता है. इसके जवाब में उनका तर्क होता है कि पिछली सदियों के पूरे आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन तब हुई मौतों के बारे में वर्तमान के अनुमानों के आधार पर जब उस समय की जनसंख्या के आधार पर गणना की जाती है तो कम से कम 10 में से 9 अपराधों के मामलों में तो द्वितीय विश्व की तुलना में भी बुरी स्थिति थी। फिर एक सदी तो सौ वर्षों की होती है उसके हिसाब से तो पिछली सदी का पूर्वार्ध भले ही युद्धों और हिंसा से सराबोर रहा हो लेकिन बाद के पचास साल तो शांति का लंबा कालखंड रहा है जिसमें कम युद्ध हुए हैं।

विचारधारा और धर्मों के आधार पर हुए हत्याकांड़ों के बारे में भी वे काफी चौंकानेवाले आंकड़े पेश करते और उसकी बहुत मौलिक तरीके से व्याख्या करते हैं। वे मैथ्यू व्हाइट की पुस्तक – द बिग बुक आफ होरीबल थिंग्स - के हवाले से बताते हैं कि धर्म 100 सामूहीक हत्याओं में से 13 यानी 4 करोड और 70 लाख हत्याओँ के लिए दोषी है। जबकि साम्यवाद 100 में से छह मगर छह करोड़ 70 लाख हत्याओं के लिए दोषी है। वे कहते हैं कि धार्मिक लोग चाहें तो इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि धर्म के नाम पर कम हत्याएं हुईं लेकिन यह कोई बहुत अचछा तर्क नहीं है क्योंकि धर्म के नाम पर हत्याएं ऐसे समय हुई जब विश्व की आबादी बहुत कम थी। मसलन धर्मयोद्धाओं ने 10 लाख लोगों की हत्या तब की जब विश्व की आबादी 40 कोरड थी। उनकी यह नरसंहार की दर नाजी नरसंहार की तुलना में ज्यादा है। इस आधार पर वे इस दलील को गलत ठहराते हैं कि धर्मों की तुलना में सेकुलर विचारधारा के लोगों ने ज्यादा हिंसा की और खून बहाया। उनका कहना है कि जब हिंसा के इतिहास का सवाल आता है तब मुख्य फर्क धार्मिक या अधार्मिक व्यवस्थाओं का नहीं होता यूटोपियाई और दुष्प्रचार पर आधारित विचारधाराओं फासिज्म, कम्युनिज्म और धार्मिक शासनों या सेकुलर और लिबरल लोकतंत्रों के बीच  होता है जो मानव अधिकारों की संकल्पना पर आधरित होते हैं। वे राजनीतिशास्त्री रूडोल्फ रूमेल द्वारा दिए आंकड़ों क आधार पर कहते हैं कि लोकतांत्रिक व्यव्सथा अन्य वैकल्पिक शासन प्रणालियों की तुलना में कम हत्यारी है।

लेखक इस पुस्तक में दो तर्क मुख्यरूप से आते हैं कि पहला कि अतीत जितना हम सोचते हैं उससे ज्यादा हिंसक और कष्टदायक था। जबकि वर्तमान जितना हम सोचते हैं उससे ज्यादा शांतिपूर्ण और कम हिंसक है। वे बुनियादी तैर पर उन विचारकों में से हैं जो यह मानते हैं कि इतिहास प्रगति की गाथा है। इसलिए ही उन्होंने पुस्तक को नाम दिया है –बैटर एंजिल्स आफ अवर नेचर- यह जुमला उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के 150 वर्ष पुराने भाषण से लिया है। उनकी यह दृढ़ मान्यता है कि मानवीय सभ्यता ने अपनी यात्रा के हर चरण में  हिंसा की एक परत को निकाल फेंका है। फिर वह चाहे घूमंतू जातियों की एक स्थान पर बसने और ज्यादा सुरक्षित होने की की प्रवृत्ति हो या राज्य का व्यवस्था स्थापना का मिशन जिसके तहत वह युद्धों और हथियारों पर एकाधिकार कायम करता है। इसके बावजूद छिटपुट हिंसा के बजाय युद्धों का ही इतिहास में हिंसक मौतों का ज्यादा योगदान रहा है। इतिहास में मुख्यरूप से तीन तरह के संघर्ष रहे हैं – गृहयुद्ध, कबीलाई और राजनीतिक समूहों के संघर्ष, और अब आतंकवाद। इसके बावजूद प्राचीन काल से मानवता के लिए अभिशाप रहे इन युद्धों पिछले दो दशकों में लक्षणीय कमी आई है जिसे वे नई शांति कहते हैं। राज्य के द्वारा संचालित संघर्ष दो विश्वयुद्धों में अपने चरम पर पहुंच गए लेकिन बाद में उनके लगतार उनमें गिरावट आ रही है। वे यह भी बताते हैं कि बीसवी सदी के तीन प्रमुख हत्यारे थे हिटलर, स्तालिन और माओ जिन्होंने बडे पैमाने पर नरसंहार किए। इसमें नई तकनालाजी ने उनकी काफी मदद की। परिवहन के तेज गतिवाले साधनों ने उन्हें अपने शिकारों को बड़ी संख्या में निर्जन स्थानों पर मारने के लिए त्वरित गति से ले जाने में मदद की। प्रोफेसर पिंकर हाल ही में हुए इराक, अफगानिस्तान, श्रीलंका, और सूड़ान के संघर्षों का गहन अध्ययन करते हैं और इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इस सदी के पहले दशक में हुए युद्धों में हुई मौतों 5 प्रति 100000 लाख योद्दा प्रतिवर्ष रही। इसकी मुख्य वजह यह है कि अंतर्राज्यीय युद्धों में 1945 के बाद कमी आती गई। पांचवे दशक के शुरूआत में हुए कोरियाई युद्ध में पहले चार वर्षों में 10 लाख लोग मरे, इसके बाद हुए वियतनाम युद्द में नौ वर्षों में 16 लाख लोग मरे। लेकिन बाद के युद्ध में मृतकों की संख्या में कमी आई 1990-91 में हुए पहले खाड़ी युद्ध में 23000 लोग मरे जबकि ईरिटिया में तीन वर्षों में 50 हजार।

उनका मानना है कि हिंसा के बारे में तुलनात्मक गणना करते समय आप कई तरीकों से सोच सकते हैं लेकिन हम नतीजे पर पहुंचते हैं कि इस मामले  में कुल संख्या के बजाय अनुपात को जानना ज्यादा उपयोगी होगा। क्योंकि यदि आबादी बढ़ती है संभावित हत्यारों, बलात्कारियों, परपीड़कों की संख्या भी बढ़ती है। इसलिए हिंसा के शिकार लोगों की कुल संख्या वही रहती है या बढ़ती है लेकिन अनुपात घटता है तो इसका मतलब है कि निश्चित ही कुछ महत्वपूर्ण घटित हुआ है। जिसके कारण इतने सारे लोग हिंसा से मुक्त रहे।

अपनी पुस्तक में पिंकर कई मिथ्या धारणाओं को ध्वस्त करते है। इनमें एक यह है कि संसाधनों का अभाव युद्ध का कारण बनता है। उनका मानना है कि ज्यादातर युद्ध अन्न या पानी जैसे या अन्य संसाधनों के अभाव के कारण नहीं होते। हाल ही में कई अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि युद्ध विचारधारा या कुशासन के कारण होते हैं।

भविष्य में हिंसा को लेकर उनकी क्या भविष्यवाणी है। उनका मानना है कि निकट भविष्य में तो मानवतावादी आंदोलनों के मजबूत होने से स्थिति सुधरेगी ही। धर्मद्रोहियों को जलाना क्रूरतूपूर्वक मौत देना, रक्त के खेल, गुलामी, कर्जदार को जेल में रखना, पांव बांधना, विकसित देशों में युद्ध आदि की कम से कम निकट भविष्य में वापसी होने के तो कोई आसार नहीं हैं। यह भी संभव है कि मौत की सजा, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, बच्चों के साथ जोर जबरदस्ती और मारपीट, समलैंगिकों को परेशान करना आदि मामलों में आनेवाले दशकों में लगातार कमी आती रहेगी। इसकी वजह यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गुलामी आदि के खिलाफ जो अभियान चलाए गए वे सफल हुए हैं। उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि क्रूर तानाशाहों की संख्या घटेगी। एटमी हथियार भी खत्म हो सकते हैं। लेकिन आतंकवाद, गृहयुद्ध, और गैर लोकतांत्रिक देशों के बीच युद्ध आदि के बारे में कोई भविष्यवाणी करना मुश्किल होता है क्योंकि वह व्यक्तियों की सोच पर निर्भर रहते हैं। अपराधों की दर के मामले में भी सभी भविष्यवक्ता नाकाम रहे हैं। इसलिए यह पाना मुश्किल है कि भविष्य में उनमें फिर बढ़ोतरी नहीं होगी।

आखिरकार दुनिया में यह सुखद परिवर्तन किस कारण आया है। प्रतिष्ठित पत्रिका इकानामिस्ट के मुताबिक पिंकर इसके लिए कांट के सुप्रसिद्ध तीन कारकों के त्रिकोण को कारणीभूत मानते हैं –मुक्त अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और बाहरी विश्व से रिश्तें। इसके अलावा जो लोग बुर्जुआ समृद्धी को पाने की आकांक्षा रखते हैं और मुक्त व्यापार को महत्वपूर्ण मानते हैं वे उन लोगों को मारने के प्रवृत्त नहीं होते जिनके साथ वे व्यापार कर सकते हैं।

- सतीश पेडणेकर

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