खराब कारोबारियों को बाहर करने की नीति बने

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किंगफिशर के मालिक की सारी संपत्ति जब्त करके इसके कर्मचारियों और कर्जदाताओं में बांट दी जानी चाहिए

विजय माल्या ने किंगफिशर के कर्मचारियों को कई महीनों से तनख्वाह नहीं दी है और कई सप्लायरों तथा कर्जदाताओं की करोड़ों की अदायगी के नाम पर हाथ खड़े कर दिए हैं। लेकिन इस घोषित तंगहाली के बावजूद उन्होंने तिरुपति मंदिर को तीन किलो सोना दान किया है, जिसकी कीमत एक करोड़ रूपया है। बीते अगस्त में उन्होंने कर्नाटक स्थित कुक्के सुब्रमण्य मंदिर में 80 किलो सोने के पत्तर चढ़े दरवाजों का चढ़ावा दिया था। शायद वे मानते हैं कि जिन तरीकों से देवताओं को खरीदा जा सकता है, वे कर्मचारियों और कर्ज देने वालों के साथ कारगर नहीं साबित होंगे। जिस आदमी पर कर्मचारियों और कर्जदाताओं की इतनी बड़ी रकम बकाया हो, वह भला यूं रेजगारी की तरह जहां-तहां सोना कैसे फेंकता चल सकता है?

फ्री इकॉनमी का मतलब

अगर इस देश में न्याय नाम की कोई चीज होती तो निश्चित रूप से यह सारा सोना जब्त कर लिया जाता और इसकी बिक्री से हासिल होने वाली रकम कर्मचारियों और कर्जदाताओं के हवाले कर दी जाती। माल्या की समूची संपदा पर पहला हक हर सूरत में उन्हीं का होना चाहिए। आर्थिक सुधारों के दो दशक बीत जाने के बाद भी हम ऐसे नियम नहीं बना पाए हैं, जिनका इस्तेमाल करके हम किसी कंपनी के घटिया प्रबंधन को उसे पूरी तरह बर्बाद कर देने के पहले ही बाहर का रास्ता दिखा सकें। शराब व्यापारी माल्या ने किंगफिशर एयरलाइंस को बिल्कुल मिट्टी में मिला दिया, जबकि अपनी क्षमता को देखते हुए उन्हें इस धंधे में आना ही नहीं चाहिए था। मुक्त अर्थव्यवस्था का मतलब सिर्फ यही नहीं है कि कंपनी मालिकों का जब भी दिल करे, वे अपन कर्मचारियों की नौकरी ले लें। मुक्त अर्थव्यवस्था वह है, जिसमें कर्जदाताओं और कर्मचारियों को अपना बकाया न मिल पाने की स्थिति में कंपनी पर कब्जा कर लेने और उसके मैनेजमेंट को निकाल बाहर करने का अधिकार होता है।

अमेरिका का दस्तूर

किसी कंपनी में मैनेजिंग शेयरहोल्डर्स या प्रमोटर (जिसे चलताऊ अर्थ में मालिक कहने का रिवाज है) भी ऐसै बहुत सारे लोगों में एक हुआ करता है, जिनके हित कंपनी से जुड़े हैं। यदि वह इन स्टेक होल्डर्स के प्रति अपनी देनदारी नहीं निभा पाता तो मुक्त अर्थव्यवस्था में उसे तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश, भारत में नियम-कानूनों और प्रक्रियाओं को अबतक सुधारा नहीं जा सका है। नतीजा यह है कि सारा गुड़ गोबर कर देने के बाद भी कंपनी के प्रमोटर कंपनी पर अपना कब्जा जमाए रख ले जाते हैं। अमेरिका में तो जैसे ही कर्जदाताओं को अपना पैसा डूबता नजर आता है, वे जरा भी देर किए बिना कंपनी को अपने काबू में कर लेते हैं। और फिर या तो वे इसे नए सिरे से व्यवस्थित करते हैं, या किसी नए मालिक को बेच देते हैं।

कंपनी मालिक को कर्जदाताओं से अस्थायी सुरक्षा चैप्टर 11 में मौजूद प्रक्रियाओं से हासिल होती है। इसमें एक न्यायाधीश फैसला करता है कि कंपनी इस हालत में चली गई है, जहां इसे भंग कर देना जरूरी है, या कर्जदाताओं, कर्मचारियों और मालिकों के आंशिक त्याग के जरिये इसे बचाया जा सकता है। कंपनी के दिवालिया होने पर उसके कर्मचारी अक्सर बच जाते हैं, लेकिन मालिक किसी सूरत में नहीं बचता। भारत में भी लक्ष्य ऐसा ही रखा जाना चाहिए। अयोग्य और दिवालिया कंपनी मालिकों के लिए यहां भी एक बहिर्गमन नीति बनाई जानी चाहिए। किंगफिशर एयरलाइंस कभी मुनाफे में नहीं रही। उछाल वाले उन दिनों में भी नहीं, जब भारत में इसकी प्रतिद्वंदी कंपनियां अच्छा मुनाफा कमा रही थीं। कर्जदाताओं को कई साल पहले ही इस कंपनी में अपना दखल बढ़ा देना चाहिए था, जब यह साफ हो चला था कि एक शराब कारोबारी का कौशल एक एयरलाइन चलाने के मामले में किसी काम का नहीं है। लेकिन भारत में कर्जदाता किसी कंपनी पर जल्दी कब्जा नहीं कर सकते। तब तो और भी, जब कंपनी का मालिक विजय माल्या जैसा सियासी रसूख वाला आदमी हो। पुराने लाइसेंस-परमिट राज में बैंक और वित्तीय संस्थाएं कंपनियों के मैनेजमेंट को बुरी से बुरी हालत में भी बचा लेती थीं। 1991 के सुधारों के बाद भी यह हालत बदली नहीं है। बैंक डूबते पैसे के पीछे नकद पैसा फेंकने का चलन जारी रखे हुए है। किंगफिशर एयरलाइंस आज इस हद तक अपनी वकत खो चुकी है कि न तो इसे जब्त करने का कोई मतलब है, न खरीददार ढूंढने का। भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन चौधुरी का आकलन है कि किंगफिशर का पुनरुद्धार करने में एक अरब डॉलर का खर्च आएगा। जब 10 करोड़ डॉलर लगाकर एक नई एयरलाइन खड़ी की जा सकती हो तो किंगफिशर के उद्धार में भला किसकी दिलचस्पी होगी। माल्या की उम्मीदें अब इस पर टिकी हैं कि अबू धाबी की एतिहाद एयरवेज किंगफिशर को बचा लेगी, लेकिन यह किस्सों कहानियों की बात लगती है।

सब कुछ जब्त

मान लीजिए, एयरलाइन पर कब्जा बेमानी है, तो क्यों न माल्या के शराब कारोबार पर कब्जा कर लिया जाए? क्यों न पेंटिंग्स से लेकर याच और पर्सनल जेट जैसी उनकी तमाम विलासिता की चीजें जब्त कर लीं जाए? उनकी क्रिकेट टीम रॉयल चैलेंजर्स, फुटबॉल टीम मोहन बागान और फार्मुला वन रेसिंग टीम फोर्स इंडिया पर कब्जा क्यों न कर लिया जाए? यह सब रखने की इजाजत उन्हें कैसे मिली हुई है? और वह सोना भी, जिसे वह मंदिरों को दान देते रहते हैं, जबकि अपने सप्लायरों और कर्मचारियों को देने के लिए उनके पास फूटी कौड़ी नहीं है? मैं हमेशा सुनता हूं कि भारत ने नव-उदार नीतियां अपनी ली हैं। लेकिन यह कोरी बकवास है। नव-उदारवाद सबसे पहले कर्मचारियों और कर्जदाताओं को यह हक देता है कि वे अपनी देनदारियों से मुकरने वाली कंपनी पर जल्दी से जल्दी कब्जा जमा करके उसे बेच दें।

यह उदारवाद की नहीं, पुराने उदारवाद की समस्या है कि वह हर हाल में कंपनी पर प्रमोटरों का कब्जा बनाए रखता है और सारा नुकसान बाकी स्टेकहोल्डर्स के मत्थे डाल देता है। इस क्षेत्र में सुधार निहायत जरूरी है।

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स