भाग्य भी बहादुरों का साथ देता है

swami.jpg

लकवाग्र्सत और जोखिम उठाने से डरनेवाली यूपीए-2 अचानक जोखिम उठानेवाली सुधारवादी बन गई है। पिछले हफ्ते उसने खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के मुद्दे पर संसद में हारने तक का जोखिम उठाया। उसकी जीत बताती है कि भाग्य भी बहादुर लोगों का साथ देता है।

अपने शासनकाल के पहले साढ़े तीन सालों में यूपीए -2 ने अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश की नकि काम कर दिखाने की। लोकसभा में उसके  अत्यल्प बहुमत ने उसके ममता बनर्जी जैसे सहयोगियों को तो वीटो का अधिकार दे दिया था। उस महिला ने पैट्रोल की कीमतों और तीस्ता के पानी के सवाल पर इसका पूरी तरह दोहन किया।द्रमुक ने तमिल टायगर्स के मुद्दे पर सरकार की बांह मरोड़ी। राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण वह कोई ऐसा सुधार लाने से बचती रही जिसके लिए कानून बनाने की जरूरत हो । इसलिए कायर और लकवाग्र्सत सरकार के तौर पर उसकी बदनामी हो रही थी।

इस बीच भ्रष्टाचार के लिए भी उसकी बदनामी हुई।सीएजी और अन्ना हजारे ने इस मुद्दे पर उभरे जन आक्रोश का उपयोग किया। इसके कारण बिहार और यूपी के चुनावों में हार हुई जब राहुल को सचमुच चारों खाने चित्त होना पड़ा।

अक्सर राजनीतिज्ञ यधास्थितिवादी से सुधारवादी तब बनते हैं जब कोई संकट पैदा होता है। हर सुधार में कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें नुक्सान होता है जो तुरंत चीखने लगते हैं। लेकिन सुधारों से विजेता भी उभरते हैं लेकिन उसके लाभ कई लोगों को मिलते हैं।इसलिए  अक्सर हारनेवालों का बड़बोलापन संभावित विजेताओं को डुबो देता है। लेकिन यह सब संकट के दौरान बदल जाता है। अचानक आम तौर पर  होनेवाला  व्यवहार राजनीतिक आत्मघात लगता है।1991 का विदेशी मुद्रा संकट आर्थिक सुधारों की राजनीतिक प्रेरणा बना क्योंकि आम तौर पर अपनाया जानेवाला रवैया तब अपनाना संभव नहीं था।

उसकी तुलना में आज बहुत गहरा संकट नहीं है।लेकिन 2012 के मध्य में यूपीए -2 तीन तरफ से मार झेल रही थी। भ्रष्ट और लकवाग्रस्त के तौर पर उसकी बदनामी हो रही थी,आर्थिक विकास दर धीमी हो रही थी, महंगाई निरंतर बढ़ रही थी (उच्च वित्तीय घाटे से जन्मी)।

रेटिंग एजंसिया मूडी और स्टैंडर्ड एंड पु्अर ने पहले ही भारत की  रेटिंग  कम कर उसे कबाड माने जानेवाले देशों से केवल एक ज्यादा का दर्जा दिया था। फिर जैसे आर्थिक स्थिति और खराब हुई उसने संकेत दिया कि भारत की रेटिंग को कम करके उसे कबाड माने जानेवाले देशों की  श्रेणी में डाला जा सकता है।

अब विदेशी पेंशन फंड़ों और म्युचअल फंड़ों ने भारतीय वित्तीय बाजारों में अरबों का निवेश किया हुआ है। उनके अपने नियम उन्हें मजबूर करते हैं कि इनवेस्टमेंट ग्रेड सिक्युरिटिज में ही  निवेश करें।यदि भारत की रेटिंग कम होकर कबाड की श्रेणी में पहुंच गई तो इन इनवेस्टमेंट फंड़ों को भारत से बाहर जाने को मजबूर होना पड़ता।इससे शेयर बाजार बुरी तरह गिर जाता और रूपये की कीमत 60 रूपए प्रति डालर हो जाती। इससे तेल सहित तमाम आयातों के दाम बढ़ जाते और महंगाई दहाई के अंकों में पहुंच जाती और चुनाव में हार को सुनिश्चित करती।

इन आशंकाओं ने मनमोहन सिंह और चिदंबरम के जैसे सुधारवादियों के हाथ मजबूत किए। आखिर में सोनिया गांधी भी  उनके साथ आईं और खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के मुद्दे पर मनमोहन सिंह के साथ सार्वजनिक मंच पर दिखाई दीं। संदेश बिल्कुल स्पष्ट और मुखर था।कायरतापूर्ण अनिर्णय की जगह सुधारों ने ले ली थी।इससे सुनिश्छित हुआ कि भारत की क्रेडिट रेटिंग कम नहीं होगी। फिर अरबों डालर आये और रूपया मजबूत हुआ। इसके बाद जनवरी 2013 से लाभार्थियों को  51 जिलों में सीधे नकदी हस्तांतरण का प्रस्ताव आया जिसे 2014 में सारे देश में लागू किया जाएगा। इसमें भी जोखिमें हैं। कई बाधाएं आना लाजिमी है।इसलिए लोगों को वह नकदी नहीं मिलंगी जिसकी वे उम्मीद करते हैं। कई पात्र लोग छूट जाएंगे जबकि कुछ अपात्रों को नकद पैसा मिल जाएगा।

अचानक कांग्रेस इस बात से बहुत खुश है कि सीधा हस्तांतरण उसे चुनाव में विजयी बना सकता है। इसमें भ्रष्टाचार और फिजूल खर्ची को खत्म करने की क्षमता भी है। लेकिन बहुत समय लगेगा।सभी के बैंक खाते खुलवाने के लिए काफी काम करना होगा। नियंत्रणों को मजबूत करना होगा। चुनावों में विजेता बनने के लिए इसमें आनेवाली बाधाओं का पता लगाया जाना चाहिए और और उसे तेजी से दूर किया जाना चाहिए।

मोटे तौरपर यह जोखिम उठाने के लिए सबसे अनुकूल समय है। कई सुधारों पर राजनीतिक दलों में आमराय नहीं है। लेकिन 1991 और पिछले हफ्ते की बहसे हमें सीखाती है कि राजनीतिक आमराय सेमिनारों से नहीं बनती वरन जोखिम उठानेवाले नेतृत्व से बनती है। सरकार को पहल करनी चाहिए और दूसरों को चुनौती देनी चाहिए कि वे या तो सुधारों को वोटिंग में हराएं या फिर जब वे सत्ता में आएं तो इन सुधारों को खारिज करें।

वर्ष 1991 में विपक्ष ने वादा किया था कि जब वे सत्ता में आएंगा तो सुधारों को खारिज कर देंगा। लेकिन जब उसने देखा कि सुधार काम कर रहे हैं तो इन दलों ने चुपचाप अपनी आपत्तियों को दरकिनार कर दिया। जोखिम लेनेवाली नरसिंहा राव के नेतृत्व ने वह आमराय पैदा की जो केवल बातचीत  और चर्चा से हासिल नहीं की  जा सकती थी। जनता का ध्यान भ्रष्टाचार के बजाय सुधार पर केंद्रीत होने से यूपीए-2 को राजनीतिक दृष्टि से लाभ हुआ है।अब उसे पेंशन,बीमा और बैंकों में एफडीआई की सीमा बढ़ानेवाले सुधार लाने चाहिए। उसे केवल संख्या कम होने के कारण डरे रहने के बजाय उसे गैर यूपीए दलों के अंतर्विरोधों का लाभ उठाना चाहिए। उसे राज्यसभा में बिल पास करना की कोशिश कर शुरूआत करनी चाहिए जहां हार उसके लिए निर्णायक नहीं होगी।जो बिल राज्यसभा में पास होता है वह निश्चित ही लोकसभा से भी पास हो जाएगा।

- स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर