बड़े सुधारों का समय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार अब छह माह से अधिक पुरानी हो चुकी है, लेकिन सवाल यही है कि हम इसकी शुरुआती प्रगति का आकलन किस रूप में किया जाए? इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर भारत की उम्मीदों को कहीं अधिक बढ़ा दिया है और लोगों को उन पर पूरा विश्वास भी है। आम चुनावों के दौरान उन्होंने जिस गतिशीलता और ऊर्जा-उत्साह के साथ कार्य किया था वह दुनिया के तमाम देशों की यात्रएं करने के बावजूद अभी भी बरकरार है। उनकी विदेश यात्रओं के क्रम में जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, म्यांमार और फिजी ही नहीं, बल्कि नेपाल और भूटान भी शामिल हैं। इन देशों की यात्र के दौरान लोगों पर उनके जबर्दस्त प्रभाव को न केवल देशवासियों ने, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों ने भी महसूस किया। मोदी के जन्मदिवस पर चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग भारत दौरे पर आए और अब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारतीय गणतंत्र दिवस के दिन 26 जनवरी को मुख्य अतिथि के तौर पर भारत की यात्र पर आ रहे हैं।
 
यदि नेहरू को छोड़ दें तो इससे पूर्व अन्य किसी भी नेता ने विदेशों में भारत की छवि बढ़ाने में इतना अधिक योगदान नहीं दिया। इसके बावजूद भी मोदी के राजनीतिक विरोधी कहते हैं कि देश में ऐसा कोई नेता नहीं हुआ जिसे पश्चिमी देशों ने वीजा देने से कभी इन्कार किया हो। सच्चाई यही है कि मोदी ने न सिर्फ एशिया को लेकर नीतियों में नयापन दिखाया है, बल्कि अमेरिका के साथ भी भारत के रिश्तों को मजबूती देने का काम किया है। चीन के साथ मोदी सरकार ने गर्मजोशी जरूर दिखाई, लेकिन उतनी ही सतर्कता भी। भारत के संदर्भ में सीमाओं पर यदि चीन ने कोई भी आकस्मिक कार्रवाई अथवा अशांति फैलाने की कोशिश की तो जापान और अमेरिका हमारे लिए सुरक्षा का ढाल बन सकते हैं। संभवत: यही कारण है कि तटवर्ती क्षेत्रों में तेल की खोज के काम में भारत चीन के निकट पड़ोसी देश वियतनाम का सहयोग कर रहा है और इतना ही नहीं उसे नौसैनिक सहयोग-समर्थन भी प्रदान कर रहा है। पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हो पा रही है। हालांकि यह सब शुरुआती दिनों की बात है।
 
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारत के साथ मित्रता कायम करने की अधिक अपेक्षा नहीं कर सकते, क्योंकि इस्लामाबाद में संसद के बाहर इमरान खान उनकी घेरेबंदी करने और विरोध-प्रदर्शनों में लगातार जुटे हुए हैं। कुल मिलाकर घरेलू मोर्चे की बात करें तो अभी भी इस बात की संभावना काफी अधिक है कि राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को जीत मिलेगी। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में भी उसका परीक्षण होना है। यदि भाजपा इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करती है तो पार्टी की विश्वसनीयता में वृद्धि होगी और कांग्रेस को अवश्य ही कुछ नया करने के लिए सोचना होगा।
 
आगामी चुनावों में जीत से भाजपा की प्रतिष्ठा और प्रभुत्व समूचे भारत में कायम हो जाएगा। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में मिली जीत से पार्टी को काफी मदद मिली है। यदि झारखंड और दिल्ली में भी चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में रहते हैं तो राज्यसभा में भी सरकार काफी मजबूत स्थिति में पहुंच जाएगी। इस समय जो बात सर्वाधिक जरूरी है वह यही कि आर्थिक सुधारों के काम को आगे बढ़ाया जाए। मोदी सरकार को अपना पहला बजट चुनावों के बाद बहुत कम समय में पेश करना पड़ा और इस कारण वह सुधारों की दिशा में बहुत काम नहीं कर सकी, लेकिन अब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की बात कहनी शुरू कर दी है। इसके लिए जरूरी नहीं कि फरवरी के बजट में ही सब कुछ पेश किया जाए। अभी जिस बात की जरूरत है वह यही कि आगामी पांच वर्षो में अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार का रोडमैप अथवा खाका क्या होगा? वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी की दिशा में आगे बढ़ना एक अच्छा संकेत है। ईंधन सब्सिडी पर भी विचार करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उर्वरक और जल सब्सिडी पर भी ध्यान देना होगा। बिजली की दरों को नए सिरे से निर्धारित करने की आवश्यकता है। रोजगार सृजन के लिए बुनियादी ढांचे में व्यापक कार्य करने होंगे। देश में अधिक लंबे समय तक मनरेगा की आवश्यकता नहीं है।
 
सरकार का असली परीक्षण विनिर्माण क्षेत्र में सुधार लाने से होगा। श्रम सुधारों की दिशा में तत्काल काम करना होगा और इसके लिए राज्यों के आंशिक कदमों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। भारत को कुछ ऐसी बड़ी विनिर्माण इकाइयों की जरूरत है जहां हजारों की संख्या में नहीं तो सैकड़ों की संख्या में रोजगार का सृजन हो सके। ऐसा करके हम जनसांख्यिकीय बढ़त का लाभ उठा सकते हैं। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों की संख्या में कम उत्पादक कार्यो से जुड़े लोगों को शहरी विनिर्माण केंद्रों तक लाना होगा। गरीबी से निजात पाने का यही रास्ता है। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों ने यही किया है। भारत को कांग्रेस की दुविधापूर्ण नीति को छोड़ना होगा, जो अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में उदारीकरण लाने के बावजूद बुनियादी ढांचे के क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रही। इस बारे में संदेह यही है कि सरकार विपक्ष से सीधे टकराव को तैयार नहीं दिखती। संभवत: वह राज्यसभा में खुद के अधिक मजबूत होने का इंतजार कर रही है और ऐसा होने के बाद वह बड़े सुधारों की दिशा में आगे बढ़ेगी, लेकिन समय मूल्यवान है। अर्थव्यवस्था को 6.5 से 7 फीसद की विकास दर पर लाने के लिए बहुत कुछ किया गया है, लेकिन मोदी का लक्ष्य अर्थव्यवस्था को 8 से 9 फीसद पर लाना है। यह लक्ष्य भूमि और श्रम बाजार में आमूल सुधार बिना नहीं हासिल किया जा सकता। इस क्रम में राजकोषीय सुधार भी जरूरी हैं।
 
राजकोषीय कमजोरी के चलते ब्याज की दरें बहुत अधिक हैं। हमें जल्दी से जल्दी संतुलित बजट पर काम करना होगा और विनिवेश के माध्यम से कर्ज में उल्लेखनीय कमी लानी होगी। इसके लिए हमें एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना होगा कि किस तरह भारत एकल अंकों में अथवा दोहरे अंकों में विकास हासिल कर सकता है। जीडीपी विकास की यह दर 8 फीसद से लेकर 11 फीसद तक हो सकती है। इसके लिए सार्वजनिक बनाम निजी स्वामित्व में नए सिरे से सामंजस्य बैठाना होगा। 1950 में सार्वजनिक क्षेत्र में तमाम नई इकाइयों की शुरुआत की आवश्यकता थी, लेकिन प्रथम 10 वर्ष अथवा उससे अधिक के बाद राष्ट्रीयकरण महज एक ढीला-ढाला विचार भर रह गया। यह सब तब हुआ जब तमाम एशियाई देश तेजी से विकास कर रहे थे। एक सफल आर्थिक शक्ति बनने के लिए इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। मेरे विचार से अच्छे दिन आने से पहले कठिन दिन आने चाहिए।
 
 
- लॉर्ड मेघनाद देसाई (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण

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