बाघों की सुरक्षा और असल मुद्दे

वाघ बनाम आदिवासी – अनुसूचित जनजाति (वन अधिकार मान्यता) बिल 2005 पर बहस को इसी रूप में पेश किया जा रहा है। आप अगर वाघ के पक्ष में हैं तो आपको आदिवासियों के वन अधिकार को मान्यता नहीं देनी चाहिए। और यदि आप आदिवासियों के पक्ष में हैं तो इसका मतलब यह है कि वाघ आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। यह पूरीतरह से झूठी दुविधा है।
जबकि हमें बाघों (और पेड़ों) को बचाने के लिए हमें वन विभाग से जंगल वापस लेने चाहिए और उन्हें वनवासियों की देखरेख में रखना चाहिए। आजादी के पहले और आजादी के बाद सह साबित हो गया है कि हमने वन विभाग पर जो निर्भरता रखी वह गलत थी। मंसूर अली खान पटौदी का गायब होना इस समस्या को उजागर करता है। यह केवल भारत ही नहीं ज्यादातर दुनिया में सहीं है और दुनिया इसका विकल्प खोजना चाहती है। वन्यजीवन संरक्षण के बारे में परंपरागत नजरिया मनुष्यों को पर्यावरण से अलग करने की सोच पर आधारित है। इसका नतीजा यह होता है कि ज्यादा से ज्यादा जगहों को नेशलन पार्क और अभयारण्य घोषित करो और वहां से मनुष्यों की बस्तियां हटाओं और फिर वहां ज्यादा से ज्यादा बंदूरधारी गार्ड लगाओ। यह पश्चिमी या पर्य़ावरणवादी नजरिया गन्स एंड गार्ड नजरिया कहा जाता है। यह नजरिया वनवासियों को वन्यजीवन और वन संसाधनों के मित्र से दुश्मन बना देता है। अध्ययनों और सर्वेक्षणों से पता चलता है कि पोचर स्थानीय लोगों जैसे ही होते हैं। वन्यजीवन का व्यापार करनेवाले लोग बाहरी हो सकते हैं लेकिन पोचर पार्कों और अभयारण्यों के आसपास रहनेवाले लोग ही होते हैं।
गन एंड गार्ड नजरिए ने उन लोगों को जिन्होंने सदियों तक विनाशकारी तत्वों से वन्यजीवन की रक्षा कीजंगलों के विनाशक के रूप में बदल दिया है। यह नजरिया शुद्ध रूप से शहरी नजरिया है। जो मानता है कि बाघ खतरे में हैं जबकि आदिवासी मानते है वे बाध के कारण खतरे में हैं। गन और गार्ड नजरिए की कीमत आदिवासियों को चुकानी पड़ती है अपने मूल रहिवासों और जीविका को छोड़कर। लेकिन इसके लाभ बाकी लोगों को मिलते हैं। हालांकि ज्यादातर हमारे जैसे शहरी इस बात पर गर्व करते है कि उन्होंने बाघों को बचा लिया और कभी कभी परिवार के साथ जंगलों की यात्रा कर आते हैं।
गन और गार्डवाला नजरिया वन्यजीवन की रक्षा की लागत वनवासियों पर थोपता है। इसके बावजूद यह नजरिया दुनियाभर में असफल रहा है। इसने कई देशों को दूसरे रास्ते अपनाने को मजबूर किया कि वन विभाग के बजाय वनवासियों को अमूल्य संसाधनों के लिए जिम्मेदार बनाया जाए। उन्होंने टेराकोटा नजरिया अपनाया। टेराकोटा नजरिए का मतलब है वन और वन्यजीवन के साथ जीविका को भी बचाने के लिए लोगों को भागीदार बनाना। इसमें लोगों को प्राकृतिक संसाधनों का संचालक बनाया जाता है। वे संसाधनों का प्रबंधन भी करते है और उनका स्वामित्व भी अक्सर उन्हीं के पास होता है। वन विभाग की भूमिका सलाहकार की होती है।
टेराकोटा नजरिया पुरानी मनीषा है। आधुनिक सरकारों के उदय से पहले चरागाहों पर चराई, जंगल, झीलें, नदियां और मत्स्यपालन जैसे कामों का सामूहिक तौर पर स्थानीय लोगों द्वारा स्थानीय नियमों और रीति रिवाजों के अनुसार अंजाम दिया जाता था। लगातार बढ़ती आबादी द्वारा उन संसाधनों की बढ़ती मांग, तेज आर्थिक विकास और विकसित होती तकनीक ने इन संसाधनों का प्रबंधन करनेवाले अनौपचारिक नियमों और प्रथाओं पर दबाव बनाए जाने  लगे। सरकार नें सुचारू रूप से काम करनेवाली अनौपचारिक संरचनाओं पर आगे को भवन बनाने के बजाय सरकार ने सामूहिक प्रबंधन और स्वामित्व अपने हाथों में ले लिया। कई लोगों को लगा था कि उन संसाधनों के उपयोग में राज्य ज्यादा विवेकशील और समतावादी होगा और ज्यादा प्रभावी संरक्षक  साबित होगा।
लेकिन हमारे संसाधनों का राष्ट्रीयकरण असल में एक शोकांतिका थी।राष्ट्रीयकृत संसाधान सामूहिक संसाधन बन गए।और या तो उनका जरूरत से ज्यादा उपयोग होने लगा या लापरवाही बरती जाने लगी।
जिम्बाब्वे के कैम्पफायर (कम्युनल अरियाज मैनेजमेंट प्रोग्राम फार इन्डीजनियस रिसोर्सेस)जो आठवे दशक में शुरू हुआ और नेपाल का नवे दशक का कम्युनिटी फारेस्ट मैनेजमेंट विराशष्ट्रीयकरण और सामुद्यिकीकरण पर आधारित टेराकोटा नजरिए के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
कैम्पफायर में सरकार वनवासियों को हाथियों सहित जंगल देती है।नतीजतन जिम्बाब्वे में हाथियों की संख्या किसी भी देश की तुलना में ज्यादा बढ़ी है। उन देशों के मुकाबले भी जो गन और गार्डवाली व्यवस्था अपनाते हैं।
ऐसा इसके बावजूद है जबकि वनवासी हाथियों की शिकार के लाइसेंस बेचते हैं। जी हां जिम्बाब्वे में आप हाथी की शिकार करने के लिए कानूनी लाइसेस खरीद सकते हैं-दस हजार अमेरिकी डालर में। केवल चिन्हीत हाथियों का ही शिकार किया जा सकता है जो प्रजनन की उम्र पार कर चुकें हैं। शिकार के लाइसेंस राजस्व का प्रमुख साधन बन गए हैं जो वनवासियों का जीवनस्तर बढ़ाते है इसके अलावा इससे हाथियों और उनके रिहाइशों की देखभाल और और हाथियों की संख्या बढ़ाने के लिए ज्यादा स्रोत उपलब्ध होते हैं।
हमारे पड़ोस नेपाल में ही सामुदायिक वन प्रबंधन बेहद सफल रहा है। सरकार के वन विभाग से वनों की जिम्मेदारी लेने के बाद वन उपयोगकर्त्ता समूहों ने नेपाल के वनों के तहत आनेवाले क्षेत्र को दोगुना कर दिया है।
उपयोगितावादी और असरदार होने के दलीलों के अलावा यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि स्थानीय समुदायों का इन संसाधनों पर मुख्य और नैतिक दावा है। वे इन संसाधनों का उपयोग सदियों और पीढ़ियों से  कर रहे हैं। सभ्य समाज में पहले किसने इस्तेमाल किया इस आधार पर संसाधनों की मालकियत को तय किया जाता है।
आज की निजी स्वामित्ववाली जमीन किसी समय जंगल रही होगी। कुछ लोगों ने कृषि के लिए उन जंगलों को काटा होगा।कुछ लोगों ने जंगलों को नहीं काटा होगा और वहीं रहने लगे होंगे। अब वनवासियों को जमीन की मालकियत देते समय उस प्रक्रिया को नहीं लागू किया जा रहा है जिसे हम अपने लिए अपनाते रहे हैं। जिन्होंने जंगलों को बचाकर रखा उन्हें हमारी जैसी तेजी से जंगल न काटने के लिए   सजा दी जा रही है। यह घोर अन्याय है कि वनवासियों के अधिकार को हम मान्यता न दें। सबसे कारगर और नैतिक समाधान यह होगा कि हम वन विभाग के हाथों से जमीन लें और उसे वनवासियों सौंप दें।
इसमें कोई गलती नहीं होना चाहिए अनुसूचित जाति बिल पर बहस को बाघ बनाम वनवासी के रूप में पेश करना पूर्ण रूप से दिग्भ्रमित करनेवाला है। असली मुद्दा यह है कि वनवासियों को वनों का संरक्षक और मालिक बनाकर पेड़ों और बाधों दोनों को बचाया जाए। हमने वनविभाग को काफी समय दिया अब वनवासियों को मौका दें।वही हमारी आशा हैं।
 
 
- पार्थ जे शाह (लेखक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के प्रेसीडेंट हैं)
जून 2005 में प्रकाशित

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.