ये दस कदम उठाकर दिखाएं प्रभु

गर्मी की छुटि्टयां और भारतीय रेल का अटूट संबंध रहा है। हर भारतीय मन में रेलवे को लेकर छुटि्टयों में की गई यात्रा की कोई न कोई रूमानी याद जरूर होती है। आज ये रूमानी यादें धुंधला गई हैं, क्योंकि सत्तारूढ़ नेताओं ने इसके साथ निजी जागीर जैसा व्यवहार कर इसे कुचल डाला है। रेलवे भारतीय व्यवस्था का लघु रूप है- अक्षम, भ्रष्ट, राजनीतिकरण से बेजार, गैर-जरूरी स्टाफ के बोझ से चरमराती असुरक्षित सेवा। सरकारी एकाधिकार और धन-आवंटन में राजनीति के कारण निवेश व टेक्नोलॉजी के लिए पैसे की तंगी इसकी मूल समस्या है। इस कारण न तो इसका विस्तार व आधुनिकीकरण हो पाया, न रफ्तार बढ़ पाई और न यह बढ़ते देश की जरूरतें पूरी कर पाई। फिर यात्रियों की सब्सिडी का भार मालभाड़े पर डालने से यह बहुत ज्यादा बढ़ गया और ग्राहक माल ढुलाई के लिए ट्रकों की ओर मुड़ गए।
 
लगभग सारे लोकतांत्रिक देशों ने रेलवे में सरकारी एकाधिकार की निजी भागीदारी को लाकर स्पर्धा को बढ़ावा दिया है। इसके बाद सभी जगह शानदार नतीजे मिले हैं। भारतीयों ने 1991 के बाद से देखा है कि एकाधिकार बुरा ही होता है। उन्होंने प्रतिस्पर्धा के कारण आई संचार क्रांति को देखा है। 20 साल पहले कौन सोच सकता था कि गरीब से गरीब भारतीय के पास भी फोन होगा! भारत में अब 1990 के 50 लाख की तुलना में 99 करोड़ फोन हैं। प्रतियोगिता के कारण टेलीफोन सेवाओं की कीमतें नीचे आई हैं, सेवाओं में सुधार हुआ है, इनोवेशन को बढ़ावा मिला है और भ्रष्टाचार में कमी आई है।
 
सौभाग्य से रेलवे के लिए अब असली उम्मीद जागी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे आधुनिक बनाने का संकल्प लिया है और सुरेश प्रभु के रूप में उनके पास रेलवे के इतिहास के सर्वाधिक कार्यकुशल और ऊर्जावान रेलमंत्री हैं। गठित की गई विभिन्न विशेषज्ञ समितियों से पता चलता है कि आगे क्या होने वाला है। इसमें नवीनतम है बिबेक देबराय समिति, जिसने अपनी अंतरिम रिपोर्ट ऑनलाइन जाहिर कर दी है ताकि जनता की राय ली जा सके। अन्य देशों के रेलवे संगठनों के सुधारों से मिले सबक के आधार पर ऐसे दस कदम उठाए जा सकते हैं, जो भारतीय रेल के वैभव को बहाल कर सकते हैं।
 
एक, जैसा कि सारे पेशेवर उपक्रमों में होता है, मालिक और प्रबंधक के बीच में दूरी बनानी होगी। यहां मालिक सरकार है, जिसका प्रतिनिधित्व रेल मंत्रालय करता है। वह रेल क्षेत्र के लिए सिर्फ नीतियां बनाए और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे। ट्रेनें चलाने वालों को संचालन संबंधी स्वायत्तता देनी चाहिए। भविष्य में अलग रेल बजट की जरूरत नहीं है और इसका परिवहन मंत्रालय में विलय कर दिया जाना चाहिए। दो, भारतीय रेल को दो स्वतंत्र संगठनों में बांट दिया जाना चाहिए। दोनों का स्वामित्व सरकार के पास रहे। एक पर रेलवे ट्रैक तथा आधारभूत ढांचे की जिम्मेदारी हो और दूसरा निजी क्षेत्र के साथ स्पर्धा में ट्रेनों का संचालन करे। इन दोनों सार्वजनिक संगठनों के अपने बोर्ड हों, जिसमें स्वतंत्र व कार्यकारी निदेशक हों। राजनीतिक मजबूरियों को देखते हुए इन संगठनों का निजीकरण ठीक नहीं होगा। तीन, स्वंतत्र नियामक यानी रेगुलेटर की स्थापना हो ताकि रेलवे ट्रैक का निष्पक्ष इस्तेमाल सुनिश्चित किया जा सके। कॉमन ट्रैक पर ट्रेनें चलाने के लिए शुल्क तय कर जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। रेग्यूलेटर सीधे संसद के प्रति जवाबदेह होगा।
 
चार, मालवाही और यात्री ट्रेनों को स्पर्धा में उतारें। निजी स्पर्धा को आकर्षित करने के लिए स्वतंत्र नियामक और स्वतंत्र ट्रैक संगठन का होना जरूरी है ताकि निजी क्षेत्र आश्वस्त रहे कि स्पर्धा निष्पक्ष होगी। पांच, भारतीय रेलवे को स्कूल, अस्पताल, प्रिंटिंग प्रेस चलाना, वॉटर बॉटलिंग करना और पुलिस बल के संचालन आदि जैसी गतिविधियों को छोड़कर सिर्फ ट्रेनों के संचालन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। रेलवे के 13 लाख कर्मचारियों में से ज्यादातर इन्हीं गतिविधियों में लगे हैं, जो संसाधनों की बर्बादी है। इससे कर्मचारियों का ध्यान भटक जाता है। छह, रेलवे की उत्पादन व निर्माण इकाइयों को स्वायत्तता दीजिए ताकि उन्हें पेशेवर कंपनियों की तरह चलाया जा सके। वे बाजार से पूंजी जुटा सकें और देश-विदेश की रेल कंपनियों से बिजनेस में स्पर्धा कर सकें। सात, दोनों रेल संगठनों में जनरल और डिवीजनल मैनेजरों को टेंडर जारी करने, खरीद और वित्तीय सहित सारे मामलों में अधिक स्वायत्तता दीजिए।
 
आठ, रेलवे के फाइनेंशियल अकाउंट्स को आधुनिक बनाना होगा ताकि बेहतर निर्णय प्रक्रिया और निवेशकों से फंड्स लेने में सहूलियत रहे। आज रेलवे कर्मचारियों के लिए मौजूदा रूट की लाभप्रदता अथवा नई परियोजना पर वास्तविक प्राप्ति का आकलन करना बहुत कठिन है। नौ, उपनगरीय और स्थानीय यात्री रेल सेवाओं को राज्य सरकारों के साथ संयुक्त उपक्रम के रूप में चलाने दीजिए। राज्यों को संघवाद की सच्ची भावना से सब्सिडी वहन करनी चाहिए। फिलहाल रेलवे इसलिए घाटे में है, क्योंकि राज्य सरकारें इसकी दरें बढ़ने देना नहीं चाहतीं।
 
दस, रेलवे को स्वस्थ्य व्यावसायिक उपक्रम बनाना है, तो उसे इनवेस्टमेंट बैंकों की मदद से असेट्स के उपयोग से संसाधन जुटाने होंगे। अभी रेलवे ‘राजनीतिक किराये’ से पीड़ित है, जिनसे इसकी संचालन लागत भी वसूल नहीं होती और यह घाटे में चली जाती है। रेलवे को सब्सिडी के लिए सरकार से भीख मांगनी पड़ती है। चूंकि सरकार के पास तो हमेशा ही तंगी रहती है, रेलवे के विस्तार व आधुनिकीकरण के लिए कभी पैसा नहीं मिल पाता। किंतु यदि राजनेताओं को रेलवे के संचालन से अलग कर दिया जाए तो अतिरिक्त जमीन बेचकर और स्टेशनों के एयर स्पेस पर निर्माण कर, उन्हें किराए पर देकर या बेचकर संसाधन जुटाए जा सकते हैं।
 
भारत की राजनीतिक वास्तविकताओं को देखते हुए समझदारी इसी में है कि रेलवे को निजी हाथों में न सौंपा जाए, बल्कि रेल क्षेत्र में स्पर्धा पैदा की जाए। इससे कर्मचारी अधिक प्रेरित और जवाबदेह होंगे, जिन्हें नेताओं के हस्तक्षेप के खिलाफ संरक्षण मिलेगा। उनका बोनस लाभप्रदता से जुड़ेगा तो सरकार उनकी पेंशन की रक्षा करेगी। अब गेंद रेल मंत्री सुरेश प्रभु के पाले में है। यदि कोई ऐसा व्यक्ति है, जो ये दस कदम उठा सकता है तो वे प्रभु ही हैं। पूर्व में कई विशेषज्ञ समितियां बनी हैं, लेकिन रेलवे हमेशा उनकी सिफारिशें लागू करने से बचने में कामयाब रही। आइए, उम्मीद करें कि मोदी सरकार भारतीय जनता के हित में सही कदम उठाकर दिखाकर दिखाएगी।
 
 
- गुरचरण दास (रेलवे के पुनर्गठन के लिए बनी उच्चस्तरीय देबराय समिति के सदस्य)
साभारः दैनिक भास्कर
गुरचरण दास

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