शिक्षकों पर ज़िम्मेदारी का भार डालना जरूरी

पिछले कुछ वर्षों के भीतर देश में छोटे छोटे पब्लिक स्कूलों की संख्या अचानक से बढ़ी हैं। ऐसे स्कूल जिनमें 20 या उससे भी कम छात्र होते हैं। देश की शिक्षा व्यवस्था के त्रासदीपूर्ण आंकड़ों से परेशान होना एक सामान्य-सी बात हो गई है। स्कूली छात्रों की अध्ययन की उपल्बधियां दयनीय ढंग से कम हो रही हैं और लगातार नीचे ही गिर रही हैं। इसके साथ ही बोर्ड परीक्षाओं के दौरान बढ़ती सार्वजनिक रूप से होनेवाली नकल और शिक्षकों की अनुपस्थित भी इसकी एक वजह है। हालांकि, शिक्षा के लिए बनी जिला सूचना प्रणाली यानि कि डायस के आंकड़े ये जाहिर करते हैं कि इसके पीछे कि वजह अब तक अनजान है, जोकि एक त्रासद बात है। ऐसे में जल्द ही एक निर्धारित नीति प्रतिक्रिया को शुरु करना ज़रुरी हैं। डीआईएसई के 21 राज्यों से एकत्रित शुरुआती आंकड़ों पर हुए अध्ययन के मुताबिक शिक्षा के अधिकार अधिनियम के लागू होने के चार साल बाद, साल 2010 से 2014 के बीच पब्लिक स्कूलों की संख्या में भले ही 13,498 का इजाफा हुआ हो लेकिन, इन स्कूलों में दाखिले लेनेवाले बच्चों की संख्या में 1.13 करोड़ तक की गिरावट आई हैं। वहीं इसके विपरीत निजी स्कूलों में एडमिशन का ये आंकड़ा बढ़ गया है और 1.85 करोड़ बच्चों ने इस दौरान इन स्कूलों में दाखिला लिया हैं। 

इसी दौरान छोटे छोटे पब्लिक स्कूलों की संख्या जिनमें 20 से भी कम बच्चे पढ़ते हैं तेज़ी से बढ़ी हैं। साल 2014-15 में, लगभग एक लाख ऐसे छोटे छोटे पब्लिक स्कूलों में बच्चों के नामांकन की संख्या प्रति स्कूल 12.7 छात्र रही हैं। यहां शिक्षक-छात्र अनुपात रहा 6.7 छात्र प्रति शिक्षक और सालाना प्रति छात्र शिक्षक की तनख्वाह पर खर्च अस्सी हज़ार से भी कम रहा। वहीं सबसे चौंका देनेवाला रहा शिक्षकों की तनख्वाह का बिल जोकि 9,440 करोड़ रुपए रहा। पचास से कम छात्रोंवाले पब्लिक स्कूलों की संख्या अधिक नाटकीय ढंग से बढ़ी और 3.7 लाख हो गयी हैं, ये संख्या साल 2014-15 में देश के कुल 10.2 लाख पब्लिक प्राथमिक स्कूलों का 36 प्रतिशत हैं। इन 3.7 लाख छोटे पब्लिक स्कूलों में केवल 29 छात्र प्रति स्कूल हैं, यहां छात्र-शिक्षक अनुपात केवल 12.7 छात्र प्रति शिक्षक हैं, वहीं प्रति छात्र-शिक्षक की तनख्वाह 40,800 रुपए सालाना हैं, वहीं चौंका देनेवाला रहा शिक्षकों की तनख्वाह का बिल जोकि साल 2014-15 में 41,630 करोड़ रुपए रहा। ऐसे में करदाताओं का पैसा एक तरीके से इन शैक्षणिक दृष्टि से गैर लाभकारी पब्लिक स्कूलों पर खर्च करना फिज़ूलखर्जी ही कहलाएगा है।

आखिर क्यों पब्लिक स्कूल बीमार और खाली हैं? इसकी कुछ वजहें राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में  शिक्षकों की 25 प्रतिशत तक की अनुपस्थिति, शिक्षकों का स्कूल में होने पर भी पढ़ाने में कम वक्त बिताना (ये जानकारी पीआरओबीई-2 की रिपोर्ट में अंकित है) और प्रतिबंधों को लागू करने में शिक्षा अधिकारियों की अक्षमता, विशेष रूप से नियमों के मामले में हो सकती हैं। दोषी शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना, क्योंकि इन शिक्षकों को शक्तिशाली यूनियनों का समर्थन प्राप्त हैं और साथ ही एमएलए-एमएलसी का भी संरक्षण प्राप्त होना इसकी मुख्य वजह हैं। पब्लिक स्कूलों के शिक्षकों में कामचोरी की प्रवृत्ति इसलिए नहीं हैं क्योंकि उन्हें पैसे कम मिलते हैं, बल्कि उन्हें तो निजी स्कूलों की तुलना में बेहतर तनख्वाह मिलती हैं और साथ ही अन्य देशों के शिक्षकों की तुलना में भी उन्हें बेहतर पैसे मिलते हैं। एनयूईपीए के एक अध्ययन के मुताबिक, साल 2014 में उनकी औसत तनख्वाह 4.8 लाख थी, जोकि भारत की पर कैपीटा इनकम का सात गुणा है। इसकी तुलना चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया से होनी चाहिए जहां शिक्षकों की तनख्वाह पर कैपिटा इनकम के दोगुने से भी कम है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का नियमन इस बीमारी को सुधारने के लिए सदी में एक बार मिलनेवाले मौके की तरह ही अवसर प्रदान करता हैं। भारत में शिक्षाविदों ने इतिहास में हमेशा से ही इसके लिए गलत तरीके बताए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनपुट पर आधारित नितियां लागू होती रही हैं, वहीं दुखद बात ये हैं कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के तहत भारत में इनपुट को बढ़ानेवाली नीतियों को बहुत अधिक विधायी बल मिला हुआ है। ये नीतियां उत्तरदायित्व को अनदेखा करने का काम करती हैं। इस क्षेत्र में आई नई संस्थाओं पर मुख्य मुद्दे के रूप में एनईपी के ड्राफ्ट के ज़रिए जवाबदेही में वृद्धि को अपनाने की ज़रुरत हैं। इसके साथ ही सरकार को जवाबदेही बढ़ाने की अन्य जगहों की सफल नीतियों को भी ग्रहण करना चाहिए। प्रति छात्र निधिकरण, एक ऐसी योजना है जोकि शिक्षा क्षेत्र में सफल कई देशों में इस्तेमाल होती हैं। ये शिक्षा सुधार का सबसे शक्तिशाली तरीका है। इससे स्कूलों और शिक्षकों की ज़िम्मेदारी को बढ़ाया जा सकेगा और ये स्कीम उन शिक्षकों के लिए भी है जो आर्थिक रूप से निर्बल रह जाते हैं। अब आगे, होना ये चाहिए कि प्रति छात्र मिलनेवाली वित्तीय सहायता सीधे स्कूलों को मिलने के बजाय, परोक्ष रूप से वाउचर के रूप में माता-पिता को मिल जाए। (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण या डीबीटी) इससे अभिभावकों का सशक्तिकरण होगा। जहां शिक्षक शिथिल पड़े, अभिभावक बच्चों को वहां से निकाल सकते हैं, उनके साथ अपने वाउचर दूसरे स्कूल ले जा सकते हैं, जिससे कि उस स्कूल को मिलनेवाली सरकारी वित्तीय सहायता कम हो जाएगी। अभिभावकों को आर्थिक दंड देने के लिए मिली ये क्षमता स्कूलों और शिक्षकों को ज़िम्मेदार बनाएगी, यहां तक की गरीब और अशिक्षित अभिभावकों को भी सशक्त बनाएगी। जवाबदेही के लिए बनी ये संरचनाएं प्रति छात्र डीबीटी अनुदान में निहित और अंतर्निहित हैं। 

डीबीटी वाउचर स्कीमों से वर्तमान स्थिति की तुलना में निष्पक्षता बढ़ेगी। गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हर बच्चे को देश में अपनी पसंद के निजी स्कूल में दाखिला लेने का अधिकार मिलेगा।  या फिर ये कहे कि कम से कम शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के तहत 25 प्रतिशत सीटों को भरने का नियम तो लागू हो ही जाएगा क्योंकि, यहां कोई लॉबी नहीं होगी इसलिए डीबीटी के गैर सहायता प्राप्त स्कूलों और निजी स्कूलों को दण्ड देने के इस तरीके में कोई समस्या नहीं आएगी। समय के साथ इसे पब्लिक और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों तक भी बढ़ाया जा सकता हैं।

सार्वजनिक अनुदान से चलनेवाले स्कूलों की अव्यवस्थित जवाबदेही के चलते अब ज़रुरत हैं कि एनईपी में अधिक दूरगामी, साहसिक फैसले लिए जाए। साथ ही राजनीतिक अर्थव्यवस्था और शासन में सुधार को जोड़ा जाए। इसके लिए ज़रुरत हैं कि संविधान के आर्टिकल 171 (3सी) में बदलाव लाया जाए जोकि राज्य विधानसभाओं में शिक्षकों के प्रतिनिधित्व को निश्चित करता है। इसने कई शिक्षकों को राजनेताओं में तब्दील कर दिया हैं। (उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश की विधान परिषद् के 17 प्रतिशत विधायक शिक्षक हैं) इसके लिए ज़रुरत हैं कि सार्वजनिक रूप से तनख्वाह पानेवाले सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों को लाभ का पद धारक के रूप में सरकार में मान्यता मिले, जिससे कि उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जा सकेगा। इससे राजनैतिक संस्कृति जोकि शिक्षकों का ध्यान पढ़ाने से हटाती हैं वो ध्वस्त हो जाएगी। इसके साथ ही चुनाव आयोग की ओर से चुनाव के वक्त पोलिंग बूथ में शिक्षकों की अधिकारिक टीम में नियुक्ति के अनुपात को कम किया जाना भी ज़रुरी हैं। 

एनपीई की शिक्षा व्यवस्था को शिक्षकों की तरक्की का दोहन साधन नहीं बनने देकर, छात्रों के परिणामों को बेहतर करने की दिशा में अब लगाना होगा। इसके लिए डीबीटी स्कूल वाउचर अनुदान और शासन सुधार के ज़रिए सरकार की ओर से सख्त और चरित्रवान कदमों की ज़रुरत हैं न कि किसी तिकड़म की। भारत के बच्चे इस सुधार के लायक है।

- प्रो. गीता गांधी किंगडन (लेखिका यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में प्रोफेसर और सिटी मान्टेसरी स्कूल, लखनऊ की प्रेसिडेंट हैं)
साभारः द इंडियन एक्सप्रेस