Corruption

नेताओं को समझना होगा कि भारत का नया मध्यवर्ग आत्मसम्मान के लिए लड़ने को तैयार है. वह अपने गुस्से को खुद जाहिर कर रहा है. जन भावना का दबाव राजनीतिक व्यवस्था व नेताओं को अस्थिर कर देगा या फ़िर एक वास्तविक राजनीतिक सुधार की नींव रखेगा.

एक साल पहले किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि कई मंत्री, राजनेता, वरिष्ठ अधिकारी और सीइओ तिहाड़ जेल में होंगे और सुनवाई का सामना कर रहे होंगे. भारत में भ्रष्टाचार अब कोई नयी खबर नहीं है, यह आम प्रतिक्रिया अप्रत्याशित और एक पहेली की तरह है. यदि ऐसा है तो फ़िर घूसखोरी के खिलाफ़ अंतहीन आंदोलन क्यों हो रहे हैं? दरअसल, आज खुद के प्रति आश्वस्त और जिज्ञासु नया मध्यवर्ग तेजी से उभर रहा है. इस मध्यवर्ग ने आत्मसम्मान और गरिमा हासिल की है और अब इसे मीडिया और राजनेताओं के द्वारा भी गंभीरता से लिया जा रहा है. अनुमान है कि मध्यवर्ग 2020 तक भारत की आबादी का 50 प्रतिशत तक हो जायेगा. तब हमारी राजनीति भी बदल जायेगी. हम आज जिन घटनाओं से रूबरू हो रहे हैं, वे आने वाले बड़े बदलाव के ट्रेलर मात्र हैं.

Author: 
गुरचरण दास

नागरिक समाज बनाम नागरिक समाज के बीच विवाद के शोर के बीच एक तरफ ऐसे लोग हैं, जो लोकपाल कार्यकर्ताओं को गैर-लोकतांत्रिक समझते हैं, जबकि दूसरी तरफ जन प्रतिनिधी हैं, जिन्होंने बहुत तेज़ी से अपनी तरफ लोगों का ध्यानाकर्षण किया है। इस सबके बीच मुझे जो बात सबसे ज्यादा खटकती है, वो ये है कि इस विवाद के इतर भ्रष्टाचार के मूल कारणों और उससे निबटने के तरीके पर एक व्यापक चर्चा का अभाव है।

मैं ना ही एक तजुर्बेकार प्रशासनिक अधिकारी हूं, जिसने जिला स्तर और सचिव स्तर पर कई साल बिताएं हों या फिर बुढ़ापे की ओर अग्रसर एक क्लर्क जिसने 30 साल फोन उठाते हुए, चिठ्ठियां टाइप करते हुए और तुजुर्बेकार नौकरशाहों से श्रुतलेख (डिक्टेशन) लेते हुए बिताएं हों। मैंने एक साल सरकार के साथ काम करके यह जान लिया है कि भारत की समस्या उसकी जटिल प्रणाली है। जिसका इज़ाद भारत ने खुद किया है।

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीतियां ईमानदार नहीं लगतीं. उनकी सरकार ने सर्वत्र बड़ी-बड़ी कंपनियों को छूट दे रखी है. ये कंपनियां आम आदमी को मनमोहन सिंह की छतरी तले कुचल रही हैं और मनमोहन सिंह की कान पर जूं भी नहीं रेंग रही है. देश का नागरिक आज पशोपेश में है. डॉ सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी निर्विवादित है. परंतु उनके नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार का भ्रष्टाचार का शीर्ष पर होना भी उतना ही निर्विवादित है. इस अंतर्विरोध को कैसे समझा जाये? विषय ईमानदारी को पारिभाषित करने का है. सामान्य तौर पर ईमानदारी को व्य्क्तिगत सच्चाई के तौर पर समझा जाता है. जैसे कोई व्यिक्ति कहे कि मैं तुम्हें 10 रुपये दूंगा और वह 10 रुपये दे दे तो उसे ईमानदार कहा जाता है. परंतु चोर यदि कहे कि मैं चोरी करने जा रहा हूं तो उसे ईमानदार नहीं कहा जाता है. दरअसल, ईमानदारी के दो पहलू होते हैं- व्यिक्तिगत एवं सामाजिक. ईमानदार उसी को कहा जाना चाहिए जो कि अपने विचारों के प्रति सच्चा होने के साथ-साथ समाज के प्रति भी सच्चा हो.

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जिन लोगों ने अन्ना हजारे के आंदोलन पर कीचड़ उछालने की कोशिश की वे भूल गए कि भारत में हमेशा से मजबूत समाज और कमजोर सरकार रही है। 8 अप्रैल, 2011 को अन्ना हजारे के भूख हड़ताल खत्म करने से एक दिन पहले मैं काहिरा में लोकतांत्रिक आंदोलन के उदारवादी सदस्यों के सामने मिस्र के भविष्य का भारतीय मॉडल पेश कर रहा था। सम्मेलन के बाद हममें से कुछ तहरीर चौक पर घूमने गए थे, जहां सरकार के खिलाफ प्रचंड आंदोलन हुआ था। अचानक मैंने खुद को मंच पर पाया और अल हिंद के करीब 37,000 प्रदर्शनकारियों को अपनी शुभकामनाएं दीं। अगले तीन मिनट तक मैं भारतीय लोकतंत्र के सबक के बारे में बताने की कोशिश करता रहा-चुनाव, मुक्ति, समानता नहीं, बल्कि कानून के शासन के ही असल मायने है। भारत में इसलिए भ्रष्टाचार फैला हुआ है क्योंकि यहां कानून का शासन कमजोर है।

Author: 
गुरचरण दास

आजादी के बाद अनशन तो कई हुए, लेकिन अन्ना हजारे का अनशन अपूर्व था| इतने कम समय में इतनी जबर्दस्त प्रतिक्रिया पहले कभी नहीं हुई| श्रीरामुलू के अनशन ने आंध्रप्रदेश बनाया और तारासिंह और फतेह सिंह के अनशन ने पंजाब बनाया| अन्ना के अनशन ने अभी तक कुछ नहीं बनाया| लोकपाल भी नहीं| लेकिन इस अनशन ने सब सीमाएं तोड़ दीं| प्रांत, भाषा, जाति, मज़हब – कोई भी दीवार टिक न सकी| मानो पूरे देश में तूफान आ गया| चार-पांच दिन में ही सरकार की अकड़ ढीली पड़ गई| उसने घुटने टेक दिए|

विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने के लिए विकास दर बढ़ाने की जरूरत है और उसके लिए दूसरी पीढ़ी का आर्थिक सुधार किया जाना जरूरी है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

अगर सिर्फ कानून बनाकार अपराध रोका जा सकता तो कभी कत्ल होते ही नही। कानून का कड़ाई  से पालन होना चाहिए वो भी निष्पक्ष तरीके से। इसीलिए अन्ना हज़ारे मांग कर रहे हैं कि सीबीआई, सीवीसी, आदि लोकपाल के अधीन हो और सरकारी दबाव से परे। जन लोकपाल बिल न सिर्फ सरकार, सांसद, नौकरशाह बल्कि न्यायपालिका पर भी निगरानी की बात कर रहा है। इसीलिए इंडिया अगेन्स्ट करपशन इसे स्वतंत्रता का दूसरा संग्राम कह रहा है।

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भारत मे भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल विधेयक लाने की मांग कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे हुये हैं और उन के द्वारा शुरु किये गये अन्दोलन मे मालूम पूरे देश भर का जन मानस जुड़ गया है. जैसे लोगों को अपनी दबी हुई कुंठा और व्यथा अभिव्यक्त करने के लिए एक मंच, एक आवाज़ मिल गयी हो.

देश भर के कार्यकर्ता इसे आजादी की दूसरी लड़ाई करार कर रहे हैं और इस काम में उनका साथ मेधा पाटकर, किरण बेदी, बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, अरविंद केजरीवाल, एडवोकेट प्रशांत भूषण, संतोष हेगड़े, स्वामी अग्निवेश जैसे समाजसेवी भी शामिल हैं।

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कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के टेप और विकिलीक्स के खुलासे पिछले एक दशक में मजबूती से सामने आए दो बुनियादी और परस्पर संबंधित राजनीतिक नजरिये की पुष्टि करते हैं। इनमें एक वैश्विक है और दूसरा स्थानीय। इनमें से पहला सत्ता की प्रकृति के बारे में है। आधुनिक विश्व में अमेरिकी सैन्य शक्ति और उसकी व्यापारिक ताकत के अतिरिक्त सत्ता सूचनाओं पर ज्यादा टिकी है, जो हथियार या खजाने पर नियंत्रण रखती है। साइबरस्पेस में मजबूती से स्थापित यह सूचना तंत्र ही शक्ति का भंडार है। दूसरे का रिश्ता हमारी अपनी राजनीतिक और आर्थिक प्रवृत्तियों से है।

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जब विकृत या गलत या उल्टी प्रोत्साहन व्यवस्था भ्रष्टाचार को दंडित करने की बजाए ईनाम देती है, तब भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है। हमें इस विकृत प्रोत्साहन का अंत करने के लिए संस्थागत परिवर्तनों की जरूरत है।

मुझे आशा है कि साल 2010 को एक ऐसे साल के रूप में याद किया जाएगा, जब नाराज मतदाता नेताओं को बाध्य कर देंगे कि वे राजनीति को एक फायदेमंद और कर मुक्त पेशे के रूप में देखना बंद करें। मीडिया में इन दिनों कई घोटाले जैसे अवैध खनन, आदर्श सहकारी समिति, राष्ट्रमंडल खेल और 2जी लाइसेंस जैसे मामले छाए हुए हैं।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

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