आरटीई

दिल्ली के निजी व महंगे स्कूलों द्वारा अब पड़ोस के आर्थिक रूप से कमजोर व पिछड़ी जाति के छात्रों को निशुल्क दाखिला देने से इंकार करना संभव नहीं हो सकेगा। जी हां, पड़ोस के निजी स्कूलों में मुफ्त दाखिले की चाह रखने वाले गरीब व पिछड़ी जाति के छात्रों के अभिभावकों को अब पर्याप्त जानकारी के अभाव में भ्रमित करना और नियम और शर्तों का हवाला देते हुए स्कूल में भर्ती करने में आनाकानी बरतना महंगा साबित होने वाला है। दिल्ली सरकार व शिक्षा निदेशालय द्वारा पहले से ही अपनाए गए कड़े रुख के क्रम में अब दिल्ली नगर निगम ने भी आस्तीनें चढ़ा ली हैं। यहां तक कि एमसीडी ने अपने अधीन क्षेत्रों में

नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलायंस के बैनर तले अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थिंकटैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्वारा आयोजित एक दिवसीय “निसा स्कूल लीडर्स सम्मिट” यूं तो बुधवार की देर रात संपन्न हो गया, लेकिन सम्मिट में उपस्थित स्कूल संचालकों व शिक्षाविदो ने स्कूली शिक्षा की बेहतरी के लिए शुरू किए गए अभियान रूपी इस मशाल को हमेशा जलाए रखने का संकल्प लिया। स्कूली शिक्षा की बेहतरी, छात्रों व अभिभावकों को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने, शिक्षण प्रशिक्षण के श्रेष्ठ तौर तरीकों और सरकारी नीतियों के कारण बंदी के कगार पर पहुंच चुके निजी बजट स्कूलों की सहायता के लिए आयोजित इस

केंद्र सरकार द्वारा वंचित व कमजोर वर्ग को गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित कराने के लिए लागू किया गया शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून स्वयं ही सर्वशिक्षा अभियान की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता प्रतीत हो रहा है। कानून में समाहित कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे देशभर के लाखों निजी (बजट) प्राइवेट स्कूल बंद होने की कगार पर पहूंच गए हैं। अकेले दिल्ली में ही 13 हजार से ज्यादा स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही इन स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों नौनिहालों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया है। दुष्परिणामों से भरे आरटीई के इन्हीं प्रावधानों के खिलाफ आवाज उठाने के उद्देश्

केंद्र सरकार द्वारा वंचित व कमजोर वर्ग को गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित कराने के लिए लागू किया गया शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून स्वयं ही सर्वशिक्षा अभियान की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता प्रतीत हो रहा है। कानून में समाहित कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे देशभर के लाखों निजी (बजट) प्राइवेट स्कूल बंद होने की कगार पर पहूंच गए हैं। अकेले दिल्ली में ही 13 हजार से ज्यादा स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही इन स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों नौनिहालों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया है। दुष्परिणामों से भरे आरटीई के इन्हीं प्रावधानों के खिलाफ आवाज उठाने के उद्देश्

कहते हैं कि किसी भी सरकारी कार्यक्रम  का  मूल्यांकन  उसके घोषित इरादों से नहीं वरन उसके गैर इरादतन होनेवाले परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। ऐसा ही एक राष्ट्रीय सरकारी कार्यक्रम है शिक्षा का अधिकार जिसका घोषित उद्देश्य है सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य़ शिक्षा उपलब्ध करना। यह  एक ऐसा मकसद है जिसके साथ किसी का मतभेद हो ही नहीं सकता।वकौन नहीं चाहता कि भारत के भावी नागरिक साक्षर और ज्ञानवान हों लेकिन इस कानून के कुछ प्रावधान ऐसे है उनके जो नतीजे निकल रहे हैं वे न केवल  कानून के घोषित लक्ष्यों को ठेस पहुंचाते हैं वरन उसके सारे उद्देश्यों पर पानी

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भारत के बारे में विदेशियों के बीच एक बात पर अवश्य राय कायम होते देखा जा सकता है। और यह राय यहां कानूनों की अधिकता और उसके न्यूनतम अनुपालन को लेकर है। यह नकारात्मक राय इन दिनों एक और कानून की अनदेखी के कारण और प्रबल हो रहा है। इस बार ऐसा आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार कानून के अनुपालन में हो रही लापरवाही और हीला हवाली के कारण हो रहा है। दरअसल,निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए वर्ष 2009 में निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को हर हाल में कड़ाई से लागू किए जाने को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ऐसा लगा कि देश में शिक्षा क्रांति का प्रादुर्भा

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चत कराने के लिए अदालती आदेश के बाद प्राइवेट स्कूलों की 25 फीसदी सीटों को गरीब बच्चों के लिए उपलब्ध कराने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारें इन दिनों एड़ी चोटी का जोर लगाए बैठी हैं। शिक्षा का अधिकार कानून 2009 का हवाला देते हुए सभी स्कूलों को ऐसा करना अनिवार्य कर दिया गया है। यह बात और है कि शिक्षा के स्तर को बनाए रखने के नाम पर प्राइवेट स्कूलों के साथ सरकारी बर्ताव स्कूल भवन का क्षेत्रफल, खेल के मैदान की अनिवार्यता, क्लास रूमों व टीचरों की संख्या, उनकी योग्यता, वेतनमान आदि के इर्द-गिर्द ही सीमट कर रह गया है। प्रशासन द्वारा प्राइवेट स्कूलों प

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