आरटीई

संसद का सत्र आरंभ होते ही नई दिल्ली का माहौल काफी सक्रिय और जोशपूर्ण हो जाता है। बावजूद इसके कि आजकल अधिकतर गतिविधियां संसद में नहीं, बल्कि संसद के बाहर पूरी की जाती हैं। इस बार के मानसून सत्र का अंतिम सप्ताह दो कारणों से महत्वपूर्ण था। पहला, कई वर्षो के गतिरोध के बाद भूमि अधिग्रहण एवं खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए। दूसरा, वह मामले अधिक स्पष्ट दिखाई दिए जहां राजनीतिक दल आसानी से समझौता कायम कर सकते हैं। यहां मैं सूचना का अधिकार, संशोधन विधेयक, 2013 की बात कर रहा हूं। ज्यादातर लोगों का मानना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 एक ऐसा कारगर हथिया

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी  (सीसीएस) और सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन (सीएसएफ) द्वारा फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के संयुक्त तत्वावधान में फेडरेशन हाउस में 29 अगस्त 2013 को राइट टू एजुकेशन पोर्टल की लॉंचिंग की जा रही है। उद्घाटन समारोह के दौरान सांसद श्री नवीन जिंदल और श्री प्रकाश जावडेकर बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहेंगे।

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संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र 1948 के अनुच्छेद 26 शिक्षा से संबंधित है जिसकी तीन धाराएं हैं। पहला, निशुल्क एवं आवश्यक प्राथमिक शिक्षा से संबंधित है तो दूसरा शिक्षा के उद्देश्यों (समझ को बढ़ावा देने, सहनशीलता, सभी राष्ट्रों, जाति व धार्मिक समूहों के साथ मित्रता) की स्थापना करता है। तीसरी धारा अभिभावकों को अपने बच्चों को दिए जाने वाली शिक्षा के प्रकार को चुनने पूर्वाधिकार की बात कहता है। अभिभावकों के चुनने का विचार शिक्षा के अधिकार (आरटीई) एक प्रमुख घटक रहा है, लेकिन भारत में शिक्षा के सुधार को लेकर होने वाली बहसों में शायद ही इस पर कभी चर्चा होती है।  

 

गैर सरकारी संस्था क्राई (चाइल्ड राइट्स ऐंड यू) की ओर से हाल ही में जारी रिपोर्ट ने बहुचर्चित शिक्षा के अधिकार (आरटीई) की कमियों की ओर एक बार फिर से ध्यान आकर्षित किया है। कुछ महीने पहले एक अन्य एनजीओ ‘प्रथम’ ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि आरटीई को लागू किये जाने के बाद शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है। इसके लिए आमतौर पर दोषी ठहराए जाने वाले कारकों, जैसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, लालफीताशाही, भ्रष्टाचार आदि को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। कमियां इस कानून के भीतर ही हैं।

राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार (आरटीआइ) के दायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के हालिया फैसले से यह पुष्टि हो गई है कि अधिकांश राजनीतिक दल धनराशि जुटाने, पार्टी टिकट देने और इस प्रकार के अन्य अंतर्दलीय मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ हैं। सबसे अधिक निराशा यह देखकर हुई कि कभी खुद को अलग तरह की पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी भी घोटालों की दागी कांग्रेस की राह पर चल रही है और आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाकर कांग्रेस को बचाने का प्रयास कर रही है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने सीआइसी के आदेश को एडवेंचरिस्ट बताया और यह अजी

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को लागू हुए आज तीन वर्ष पूरे हो गए। इस मौके पर देश भर में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर बेहतर शिक्षा, स्कूलों व अध्यापकों की गुणवत्ता आदि पर ढेरों बातें हुईं। अधिकांश चर्चाओं परिचर्चाओं का मुख्य केंद्र सरकार द्वारा इस मद में खर्च की जाने वाली धनराशि, सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति व स्कूलों में पिछले तीन वर्षों के दौरान हुए दाखिलों की बातें ही रहीं। छात्रों को किस प्रकार के कमरों में पढ़ाया जाए? स्कूल का आकार कम से कम कितने क्षेत्र में फैला होना चाहिए? कक्षा में अधिकतम छात्र कितने होने चाहिए? मिड डे मिल का मेन्यू क्या हो ताकि छात

- गुजरात मॉडल में स्कूल भवन, खेल के मैदान आदि की अनिवार्यता की बजाय छात्रों के प्रदर्शन को बनाया गया है मान्यता प्रदान करने का आधार

- आरटीई के गुजरात मॉडल को अपना दिल्ली सरकार बचा सकती है 2 हजार स्कूलों और 4 लाख छात्रों का भविष्य

दिल्ली के निजी व महंगे स्कूलों द्वारा अब पड़ोस के आर्थिक रूप से कमजोर व पिछड़ी जाति के छात्रों को निशुल्क दाखिला देने से इंकार करना संभव नहीं हो सकेगा। जी हां, पड़ोस के निजी स्कूलों में मुफ्त दाखिले की चाह रखने वाले गरीब व पिछड़ी जाति के छात्रों के अभिभावकों को अब पर्याप्त जानकारी के अभाव में भ्रमित करना और नियम और शर्तों का हवाला देते हुए स्कूल में भर्ती करने में आनाकानी बरतना महंगा साबित होने वाला है। दिल्ली सरकार व शिक्षा निदेशालय द्वारा पहले से ही अपनाए गए कड़े रुख के क्रम में अब दिल्ली नगर निगम ने भी आस्तीनें चढ़ा ली हैं। यहां तक कि एमसीडी ने अपने अधीन क्षेत्रों में

नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलायंस के बैनर तले अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थिंकटैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्वारा आयोजित एक दिवसीय “निसा स्कूल लीडर्स सम्मिट” यूं तो बुधवार की देर रात संपन्न हो गया, लेकिन सम्मिट में उपस्थित स्कूल संचालकों व शिक्षाविदो ने स्कूली शिक्षा की बेहतरी के लिए शुरू किए गए अभियान रूपी इस मशाल को हमेशा जलाए रखने का संकल्प लिया। स्कूली शिक्षा की बेहतरी, छात्रों व अभिभावकों को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने, शिक्षण प्रशिक्षण के श्रेष्ठ तौर तरीकों और सरकारी नीतियों के कारण बंदी के कगार पर पहुंच चुके निजी बजट स्कूलों की सहायता के लिए आयोजित इस

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