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एक महत्वपूर्ण सवाल: क्या आर्थिक स्वतंत्रता से सचमुच लोगों के जीवन स्तर में कोई सुधार आता है? श्रीलंका में आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा है। यहां आर्थिक और सामाजिक माहौल भी अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में बेहतर है। फ्रेजर तालिका में आर्थिक मायने में ज्यादा मुक्त देशों और कम मुक्त देशों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में आश्चर्यजनक अंतर देखने को मिलता है।
 

सरकारी नियंत्रण फर्जीवाड़े़ और काला बाजारी को बढ़ावा देता है। यह सत्य का दमन करता है और वस्तुओं की गहन कृत्रिम कमी पैदा करता है। यह लोगों को कहीं का नहीं छोड़ता है और उन्हें उपक्रमण से वंचित करता है। यह लोगों को स्वावलंबी होने के गुणों का नाश करता है। जाहिर तौर पर, सरकार की बढ़ती शक्तियां मुझे भयभीत करती है। भले ही यह लोगों को शोषित होने से बचाकर यह अच्छा काम करती है, लेकिन व्यैक्तिकता (निजी), जो कि सभी उन्नतियों के हृदय में वास करती है,&

उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों को आमतौर पर पिछड़ा मान लिया जाता है। सामाजिक विकास के तमाम पैमानों पर ये राज्य पिछड़े हुए हैं, चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या स्त्री-पुरुष बराबरी हो। जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्यों को पूरा करने में ये राज्य सबसे बड़ी बाधा हैं, दक्षिणी राज्यों ने औसतन 2.1 जन्म प्रति दंपति का लक्ष्य पा लिया है, यानी उनकी जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई है। इसलिए जब ऐसे आंकड़े आते हैं, जिनसे पता चलता है कि इन राज्यों ने दक्षिणी राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है, तो यह सुखद लगता है।

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माओवादी उभार के विषय पर लिखी गई एक पुस्तक ‘हैलो बस्तर‘ के लोकार्पण के अवसर पर पुस्तक के लेखक राहुल पंडिता ने छोटे मोटे अधिकारियों और वन ठेकेदारों द्वारा जनजातियों के भारी शोषण पर रोशनी डाली। उन्होंने माओवादी विरोधी निगरानी बल सलवा जुडूम की निंदा की और कहा कि आदिवासियों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वे माओवादियों के साथ मिलकर बंदूकें उठाएं और अपने हक के लिए लड़ें।

यह बैठक उसी शहर में थी और उस रामलीला मैदान से ज्यादा दूर भी नहीं थी, जहां कुछ दिन पहले तक भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध में बाबूराव हजारे अनशन पर बैठे थे। उनके इस अनशन ने सरकार, संसद और खबरिया टेलीविजन चैनलों को हिला कर रख दिया। लेकिन एक पांच सितारा होटल के वातानुकूलित और शांत माहौल में कारोबारी शिक्षा के भविष्य पर चल रहा साक्षात्कार मानो किसी अलग ही दुनिया में था। ऐसी दुनिया, जो देश भर में मध्य वर्ग के प्रदर्शनों और इनसे छुटकारा पाने की राजनीतिक तबके की काल्पनिक कोशिशों से परे थी।

गुडग़ांव के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र में कदम रखते ही अन्ना पक्ष और सरकार के बीच चल रही तनातनी तो और दूर की चीज होती, बशर्ते टेलीविजन चैनलों पर लगातार इसका प्रसारण नहीं हो रहा होता। इस शहर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और बढ़ती निजी पहल की टक्कर स्वेच्छा से सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की गैर मौजूदगी से होती है। भारत के विकास की दोहरी गति का यह सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

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