Religion

जैन पर्व पर्युषण को देखते हुए पिछले दिनों मांस खाने पर सरकार द्वारा लगाये गए प्रतिबन्ध को लेकर काफी विवाद हुआ। कई जगह विरोध प्रदर्शन भी हुए। पर्युषण वैसे तो बीस दिन चलता है। फिर भी महारष्ट्र सरकार ने चार दिन तक जानवर वध और मीट की बिक्री पर बैन लगाया था। हालाँकि इस बैन में मछली बेचना और खाना बैन नहीं था क्योंकि सरकार की दलील थी कि मछली का वध नहीं किया जाता। वह पानी से निकालने पर खुद ब खुद मर जाती है। ये बैन महारष्ट्र से निकल, कुछ अन्य राज्यों में भी गया।  
 
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भारत जैसे आजाद मुल्क में इन दिनों ‘बैन’ यानी ‘प्रतिबंध’ शब्द अखबारों और समाचार चैनलों में खूब सुर्खियां बटोर रहा है. आम तौर पर प्रतिबंध का नाम सुनते ही किसी ‘कठमुल्ला’ और उसके उल-जुलूल फतवे का ध्यान आता है, मगर हमारे देश में इन दिनों सेंसर बोर्ड (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड) और प्रतिबंध एक दूसरे का पर्याय बनते नजर आ रहे हैं.

मार्क्स ने कहा था धर्म अफीम है। लेनिन ने कहा था धर्म केवल एक निजी मामला नहीं है। आज हमारे बीच न मार्क्स हैं न लेनिन। मगर धर्म है। मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत पुराने पड़ चुके हैं, मगर धर्म पुराना होकर भी खत्म नहीं हुआ। यह निरंतर फैल रहा है। या कहें हम धर्म को अपनी सुरक्षा के लिए फैला रहे हैं। हम डरे हुए हैं। धर्म से अलग नहीं होना चाहते। धर्म और ईश्वर हमारा सहारा हैं। यहां हर कोई धर्म और ईश्वर की छतरी में खुद को सुरक्षित महसूस करता है।

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