भाजपा

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- 'खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया " सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

अगले महीने होने वाले आम चुनाव भारतीय इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण चुनाव हो सकते हैं। देश के सामने विशाल युवा आबादी के रूप में सीमित मौका है। यदि हम उचित प्रत्याशी को चुनते हैं तो यह फैसला करोड़ों भारतीयों की जिंदगी में समृद्धि लाएगा और वक्त के साथ भारत एक मध्यवर्गीय देश हो जाएगा। यदि हम गलत उम्मीदवार चुनते हैं तो फायदे की यह स्थिति विनाश में बदल सकती है और भारत इतिहास में पराजित देश के रूप में दर्ज हो सकता है।

Author: 
गुरचरण दास

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे एक नई-बिलकुल नई इबारत लिख रहे हैं। इसलिए नहीं कि कांग्रेस दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में से कहीं भी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो सकी, बल्कि इसलिए कि देश की राजधानी में आम आदमी पार्टी के उभार ने देश को एक नया संदेश दिया है। बमुश्किल एक साल पुराने दल-आप-की दिल्ली में अप्रत्याशित और उल्लेखनीय जीत पर शेष देश में जैसी प्रतिक्रिया हो रही है उससे यह तो साफ है कि आम जनता ने इस संदेश को ग्रहण कर लिया है, लेकिन यह कहना कठिन है कि राजनीतिक दल भी यह सही तरह समझ गए हैं कि उनके लिए अपने तौर-तरीकों में बद

विधानसभा चुनावों के लिए घोषणापत्र आने का सिलसिला शुरू हो गया है। हमारे देश में हाल के वर्षों में चुनावों का चरित्र तो बदला है, पर घोषणापत्रों की भाषा नहीं बदली। आज भी उनमें हवाई बातें ज्यादा मिलती हैं। भारी-भरकम शब्दों की कलाकारी के जरिए वादे किए जाते हैं।

डॉलर के मुकाबले रूपया अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। सरकार और नीति निर्धारकों द्वारा रूपये को गिरने से बचाने के लिए तमाम कृत्रिम जतन किए जा रहे हैं लेकिन इससे रूपए की सेहत पर कोई असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। उधर, विभिन्न दलों के बीच इस बाबत राजनीति भी जम कर हो रही है। रूपए की इस हालत के लिए सभी एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं। देखें एक मजमून: 

 

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राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार (आरटीआइ) के दायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के हालिया फैसले से यह पुष्टि हो गई है कि अधिकांश राजनीतिक दल धनराशि जुटाने, पार्टी टिकट देने और इस प्रकार के अन्य अंतर्दलीय मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ हैं। सबसे अधिक निराशा यह देखकर हुई कि कभी खुद को अलग तरह की पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी भी घोटालों की दागी कांग्रेस की राह पर चल रही है और आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाकर कांग्रेस को बचाने का प्रयास कर रही है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने सीआइसी के आदेश को एडवेंचरिस्ट बताया और यह अजी

राजनैतिक हितों व वोट बैंक के स्वार्थ के वशीभूत हो सियासी दलों द्वारा निजीकरण, मुक्त बाजार व पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति की चाहे जितनी अनदेखी व आलोचना की जाए। लेकिन वास्तविकता यही है कि महंगाई की समस्या का समाधान किसी सरकार के पास नहीं बल्कि स्वयं बाजार के पास ही होता है। यदि बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति हो तो वस्तुओं/सेवाओं की कीमतों में उतरोत्तर कमी व गुणवत्ता में तुलनात्मक रूप से वृद्धि देखने को मिलती है। अर्थशास्त्र के इस सामान्य से नियम की न केवल अनदेखी की जाती है बल्कि लोगों के मन में बाजार को लेकर भ्रम भी पैदा किया जाता है।

बीटल्स का एक गीत है, 'कैंट बाय मी लव' (अपने लिए मैं प्यार तो नहीं खरीद सकता)। इसी तर्ज पर इस साल के बजट की थीम है, 'अपनी पार्टी के लिए मैं चुनाव तो नहीं खरीद सकता'। वित्तमंत्री आम तौर पर चुनाव से ठीक पहले वाले बजटों में सब्सिडी और कर्ज माफी के रूप में खुले हाथों रेवड़ियां बांटते हैं। ऐसे उपाय वोट दिलाने में ज्यादा कारगर नहीं होते, फिर भी वित्तमंत्री अपनी तरफ से उम्मीद नहीं छोड़ते। बहरहाल, वित्तमंत्री पलनियप्पन चिदंबरम ने अभी जो चुनावी बजट पेश किया है, उसमें उन्होंने मुफ्त का चंदन घिसने से भरसक परहेज किया है। वित्तीय मितव्यय को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वोट हासिल करने के

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

जब से भारतीयों विशेषकर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध कर रही राजनैतिक पार्टियों को पता चला है कि वालमार्ट ने भारत में एफडीआई को मंजूरी देने के प्रति सहमति कायम कराने के लिए ‘लॉबिंग’ के मद में सवा सौ करोड़ रूपए की भारी भरकम धनराशि खर्च की है, उनकी भृकुटि तन गई है। एफडीआई के मुद्दे पर लोकसभा में वोटिंग के दौरान हुई हार से तिलमिलाए राजनैतिक दलों को जैसे सरकार को गलत और खुद को सही साबित करने का एक बड़ा मौका मिल गया। मुख्य विपक्षी दल सहित अन्य दलों ने जिस प्रकार लॉबिंग पर हाय तौबा मचाना शुरू किया और संसद की कार्रवाई में गतिरोध पैदा किया वह उनकी अधीरता

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