kerosene subsidy

“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्य वस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है।