परेशानी

मुझे वह दिन याद आता है। दोपहर बाद का वक्त था। मुंबई के एक्सप्रेस हाईवे पर ट्रैफिक जाम था। यह महत्वपूर्ण उपनगरीय हाईवे एयरपोर्ट सहित महानगर के महत्वपूर्ण स्थानों को जोड़ता है। सड़क पर फंसे पड़े कई अन्य लोगों की तरह मुझे भी फ्लाइट पकडऩी थी। कोई सामान्य दिन होता तो टर्मिनल तक पहुंचने में दस मिनट लगते। पर उस दिन आधे घंटे से ट्रैफिक एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा था। कोई सड़क नहीं बन रही थी और न कोई दुर्घटना हुई थी। पर कुछ पुलिसवालों ने ट्रैफिक रोक रखा था। मैंने कारण पूछा तो छोटा सा जवाब मिला, 'वी

सार्वजनिक स्थानों पर महिला शौचालय एक अत्यंत उपेक्षित मुद्दा रहा है। इस मुद्दे पर खुलकर बात करना तथा इस कमी को सार्वजनिक मंचों पर उठाना महिलाओं तथा महिला प्रतिनिधियों के लिए भी संकोच का विषय रहा है, लेकिन हाल के वर्षो में यह चुप्पी टूटी है। मीडिया ने भी इस मुद्दे को विशेष रूप से महत्व दिया और इस सवाल को गंभीरता से उठाया। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में ही राजौरी गार्डेन बाजार में महिला टॉयलेट के नहीं होने को अच्छा-खासा कवरेज दिया गया। दिल्ली के राजौरी गार्डेन बाजार में 600 दुकानें है, लेकिन एक भी महिला टॉयलेट नहीं है, जबकि एमसीडी ने पुरुषों के लिए चार टॉयलेट बनाए हैं। इस हकीकत

दिल्ली से सटे नोएडा स्थित एक निजी स्कूल की कक्षा दो की छात्रा रिम्पी (परिवर्तित) बीते दिनों स्कूल से घर लौटते ही एक नयी जिद पकड़ कर बैठ गई। कहने लगी कि कल से मैं स्कूल रिक्शा से नहीं बल्कि जाउंगी बल्कि स्कूल वैन या स्कूल बस से जाउंगी। रिम्पी की मां श्वेता (परिवर्तित) को लगा कि रिम्पी हमेशा की भांति थोड़ी ही देर में यह जिद भी भूल जाएगी, लेकिन रिम्पी थी कि मानने को तैयार ही नहीं हो रही थी। थककर श्वेता ने रिम्पी की बात मान ली और उसे स्कूल वैन अथवा स्कूल बस से भेजने को राजी हो गई। लेकिन उन्होंने रिम्पी से पहले इस जिद का कारण बताने को कहा। दरअसल, रिम्पी का घर स्कूल के पास ही ह