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“माल-ए-मुफ्त, दिल–ए-बेरहम, फिर क्या तुम, क्या हम?” हमारी एक आदत सी हो गई है। हम हर चीज की अपेक्षा सरकार या सरकारी व्य वस्था  से करते हैं। यह ठीक है कि हमारे दैनिक जीवन में सरकार का दखल बहुत अधिक है बावजूद इसके हम उस पर कुछ ज्य़ादा ही निर्भर हो जाते हैं। एक कहावत है कि किसी समाज को पंगु बनाना है तो उसे कर्ज या फिर सब्सिडी की आदत डाल दो, वो इससे आगे कभी सोच ही नहीं पाएगा। देश की राजनीति में ये कथन बहुत मौजूं है।  

Author: 
नवीन पाल

किसी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक सक्षमता। व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है।

Author: 
शिवानंद दिवेदी

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च क

संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में शिक्षा के अधिकार को शामिल किए जाने के बाद एक बार वह पुराना सवाल फिर उठने लगा है। सवाल यह कि देश के सभी बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार मिलना ही चाहिए। 1935 में जब भारत सरकार अधिनियम के तहत गठित राज्यों की सरकारों को जिन आठ विषयों पर शासन करने का अधिकार तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दिया था, उनमें से एक अधिकार शिक्षा व्यवस्था का भी संचालन था। गांधीजी को तब आने वाली चुनौतियों का पता था, इसीलिए उन्होंने डॉक्टर जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में राज्यों की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, इस पर विचार करने की जिम्मेदारी दी थी।