Gurcharan Das

आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनावों में मिली सफलता से तमाम भारतीय नागरिक मंत्रमुग्ध हैं। आम आदमी पार्टी का नेतृत्व 45 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल के हाथों में है, जो फिलहाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। यह पार्टी महज एक साल पुरानी है, लेकिन इसकी अपार लोकप्रियता भारत के दो प्रमुख राजनीतिक दलों-वाम नीतियों के प्रति झुकाव रखने वाली कांग्रेस और हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सर्वोच्चता को चुनौती पेश कर रही है। अपनी तमाम प्रशंसनीय विशेषताओं के बावजूद आप वह पार्टी नहीं है जो अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर ला सके अथवा रोजगार और विकास के संदर्भ में भारत की क्षमताओं

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गुरचरण दास

वह अक्टूबर के शुरुआती दिनों की एक खुशनुमा शाम थी। एक मुख्य समाचार चैनल के एंकर अरविंद केजरीवाल के नवीनतम शिकार की करतूतों की व्याख्या करते हुए गला फाड़-फाड़कर लालच पर दोष मढ़ रहे थे। उसी दिन केजरीवाल ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ से गलत तरीके से सस्ती जमीन लेने के आरोप लगाए थे। अगले ही पल एंकर बताने लगे कि इस पूरी समस्या की जड़ क्रोनी कैपिटलिज्म यानी राजनेताओं की मिलीभगत से चलने वाले व्यावसायिक उपक्रम हैं। हमारे मीडिया में शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब पूंजीवाद की व्याख्या के लिए लालच शब्द का इस्तेमाल न किया जाता हो। वे कहते हैं कि यदि

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गुरचरण दास

कई लोगों को यह पसंद नहीं है कि बजट को सुर्खियों  में स्थान मिले! लेकिन मेरा मानना है कि राजनीति की खबरों के बीच अगर बजट के बहाने दो सप्ताह के लिए हमारा ध्यान देश की आर्थिक सेहत की ओर जाता है तो यह अच्छी बात है! वर्ष १९९१ से हम यही उम्मीद करते आए है की वित्त मंत्री का बजट भाषण देश की भावी अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण पेश करे !लेकिन ६ जुलाई २००९ को ऐसा नहीं हुआ! राष्ट्र नई सरकार से अगले पांच साल के लिए आर्थिक मिशन का इंतजार कर रहा था, लेकिन प्रणव मुखर्जी यह अवसर चूक गए!

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लेखक और आर्थिक मामलों के जानकार गुरचरण दास वैश्विक आर्थिक मंदी के एक साल बाद भी मानते हैं कि भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के विकास के लिए उदारीकरण ही सही नीति है। वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के समय हुए बैंकों के राष्ट्रीयकरण को गलत मानते हैं। उनका मानना है कि गरीबों की मदद करनी है तो उनके लिए चलाई जा रही तीन दर्जन योजनाएँ बंद होनी चाहिए और उनकी पहचान करने के बाद उनके बैंक खातों में सीधे पैसा भेजा जाना चाहिए।

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मेरे भूमंडलीकरण के संबंध में साफ विचार हैं। अर्थशास्त्र में एक पुरानी बात बतलाई जाती है । यदि व्यापार और पूंजी निवेश के आधार पर गरीब देश का संबंध अमीर देश के साथ स्थापित हो जाता है तो कालांतर में दोनों देशों का जीवन स्तर समान हो जाता है । इसे ‘थ्योरम आफ कंवर्जेंस’कहा जाता है। यह एडम स्मिथ का विचार है। 20वी सदी के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पाल सैमुअलसन ने  इस सिद्धांत को सिद्ध भी कर दिया था।

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गुरचरण दास

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चक्कर में पंद्रह महीने जेल में बिताकर लौटे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा कुछ हफ्ते पूर्व जब चेन्नई पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। उन्मादी भीड़ उस शख्स के लिए आतिशबाजी कर रही थी, जो तमिलनाडु चुनाव में अपनी पार्टी की हार के लिए काफी हद तक जिम्मेदार था। जिसने दुनिया की नजरों में भारत की छवि खराब कर दी और केंद्र सरकार को झुकने के लिए मजबूर कर दिया। इसके अगले ही हफ्ते राजा जब अपने निर्वाचन क्षेत्र नीलगिरिस व गृहनगर पेरंबलूर पहुंचे तो उनका और भी जबरदस्त स्वागत किया गया। अपने देश और अपनी पार्टी को इतना अधिक नुकसान पहुंचाने पर उन्हें दंडित करने के

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गुरचरण दास

टाम पामर ने कई लेखों की एक अनूठी श्रृंखला तैयार की है जिसमें पूंजीवाद के नैतिक आयाम के बारे में श्रेष्ठ चिंतन को संकलित किया गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस प्रस्तावना के जरिये मुझे इस बहस में योगदान करने के लिए आमंत्रित किया गया।

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गुरचरण दास

पिछले लगभग एक माह की अवधि में हमने एक अद्भुत तमाशा देखा, जिसमें भारत के जनतंत्र की जीत हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 24 नवंबर को सरकार ने एक साहसी और परिवर्तनकारी आर्थिक सुधार की घोषणा करते हुए रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दी। इसके बाद देशभर में राजनीतिक फलक पर तूफान-सा उठ खड़ा हुआ और अंतत: सरकार को इस सुधार को स्थगित करना पड़ा।

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गुरचरण दास

उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव के माहौल को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी अस्पताल में आपातकालीन ऑपरेशन चल रहा हो। दोनों में ही दिमाग में तरह-तरह के ख्यालात आते है। विश्व आर्थिक व्यवस्था, जिसे पूंजीवाद कहा जाता है, बड़े संकट से जूझ रही है, किंतु उत्तर प्रदेश के लोगों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। उन्हे तो बस इससे मतलब है कि लखनऊ में उन पर कौन शासन करेगा। अमेरिका और यूरोप, दोनों की माली हालत खस्ता है। यहां तक कि भारत की अर्थव्यवस्था भी धीमी पड़ गई है। रिटेल में एफडीआइ को लेकर हुई हालिया बहस से साफ हो गया है कि हम बाजार को लेकर अभी भी शंकालु है।

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गुरचरण दास

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