मस्तिष्क

सम्पूर्ण विश्व में शहरीकरण श्रम विभाजन की सहायता से समृद्धि बढ़ाता है। इसलिए भारत जैसे देशों में शहरीकरण को संपन्नता बढ़ाने के साधन के रूप में अपनाना सरकार के पिछले 50 वर्षों के प्रयासों (ग्रामीण विकास के नाम पर निर्रथक धन का व्यय) की अपेक्षा बेहतर विकल्प है। अभी हाल ही के आर्थर एंडरसन फार्च्यून के विश्वव्यापी सर्वे में भारत के शहरों को सबसे खस्ताहाल स्थिति में पाया गया। निश्चित ही संपन्न देश होने का यह तरीका नहीं है।

बुद्ध के जमाने में हिन्दुस्तान की आबादी दो करोड़ थी। यह आबादी दो करोड़ ही रहती ज्यादा नहीं हो सकती थी क्योंकि दस बच्चे पैदा होते थे और नौ को मरना ही पड़ता था। क्योंकि न तो भोजन था न दवा थी। न जगह थी न मकान था, न इंतजाम था। उनके शरीर को बचाने का कोई उपाय न था। पिछले डेढ सौ वर्षों में दुनिया में एक्सप्लोजन हुआ है मनुष्यजाति का। आज साढ़े तीन अरब लोग हैं। ये साढ़े तीन अरब लोग पूंजीवाद की व्यवस्था के कारण जीवित हैं अन्यथा वे जीवित नहीं रह सकते थे – पूंजीवादी व्यवस्था के बिना कल्पना से बाहर है कि साढ़े तीन अरब पृथ्वी पर जी जाएं।