मुक्त बाजार

किसी भी शब्द को लेकर समाज में एक ख़ास किस्म की सकारात्मक अथवा नकारात्मक अवधारणा का बन जाना कोई नई बात नही है. 'बाजार' अर्थात 'मार्केट' शब्द  भी इससे अछूता  नही  है। आमतौर  पर  यदि  आप  किसी भी व्यक्ति से  एक सवाल पूछें कि क्या देश में  बाजार के लिए आजाद एवं उदार माहौल होना चाहिए ? अथवा क्या बाजार पर बंदिशों की बजाय छूट का माहौल ज्यादा होना ठीक है ? आपको बहुतायत में जो जवाब मिलेगा वो 'नही' में होगा।

- बदले माहौल में सरकार को अंपायर की भूमिका में होना जरूरी मान रहे हैं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा

"लेकिन हम सभी मुक्त अर्थव्यवस्था की ईच्छा रखते हैं... न केवल इसलिए कि यह हमारी स्वतंत्रता की गारंटी है, बल्कि इसलिए भी कि यह धन के सृजन का और पूरे देश को संपन्न बनाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है...।"

- मार्ग्रेट थैचर (1925-3013)

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बीते 15 जुलाई को आयरिश रॉक स्टार व अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता बोनो को फ्रेंच गणराज्य के ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स का कमान्डर बनाया गया। अब शायद वे ही फ्रेंच पार्लियामेंट को “साउंड इकोनॉमिक्स” सिखा सकें। यहां कि पार्लियामेंट लाभ कमाने वाली कम्पनियों को फैक्ट्रियों को बंद करने से रोकने के लिए एक और सोशलिस्ट कानून लाने के बाबत विचार कर रही है।

बोनो? क्या ये वही नहीं हैं जो आर्थिक विकास की समस्याओं के लिए सरकारी समाधान की वकालत के लिए ज्यादा जाने जाते हैं?

सम्पूर्ण विश्व में शहरीकरण श्रम विभाजन की सहायता से समृद्धि बढ़ाता है। इसलिए भारत जैसे देशों में शहरीकरण को संपन्नता बढ़ाने के साधन के रूप में अपनाना सरकार के पिछले 50 वर्षों के प्रयासों (ग्रामीण विकास के नाम पर निर्रथक धन का व्यय) की अपेक्षा बेहतर विकल्प है। अभी हाल ही के आर्थर एंडरसन फार्च्यून के विश्वव्यापी सर्वे में भारत के शहरों को सबसे खस्ताहाल स्थिति में पाया गया। निश्चित ही संपन्न देश होने का यह तरीका नहीं है।

दलित विचारक व चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा है कि देश के दलितों के उत्थान की प्रक्रिया में आरक्षण के मुकाबले मुक्त बाजार व्यवस्था ज्यादा कारगर है। उन्होंने कहा है कि आरक्षण की व्यवस्था महज 10 प्रतिशत लोगों का फायदा कर सकती है जबकि मुक्त बाजार व्यवस्था में 90 प्रतिशत दलितों के उत्थान की क्षमता है। बाजारवाद के फायदों को गिनाते हुए चंद्रभान ने कहा कि यह बाजारवाद की ही देन है कि सदियों से जारी दलितों और गैर दलितों के बीच के रहन-सहन, खान-पान और काम-काज का फर्क समाप्त हो गया है। वह एशिया सेंटर फॉर इन्टरप्राइज (एसीई) द्वारा आयोजित पहले अंतर्राष्ट्रीय एशिया लिबर्टी फोरम (एएलएफ) के

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