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बजट 2017 पेश करने का समय सिर पर आ गया है और शिक्षा व्यवस्था का क्षेत्र ऐसे कुछेक क्षेत्रों में शामिल है जिन पर वित्त मंत्री को तुरंत ध्यान देना चाहिए। हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल तहस-नहस हो चुकी है और उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पा रही। हम जब तक इसे दुरुस्त नहीं करेंगे, तब तक अच्छे दिन लाने की सरकार के तमाम कोशिशें बेकार साबित होंगी। 

संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में शिक्षा के अधिकार को शामिल किए जाने के बाद एक बार वह पुराना सवाल फिर उठने लगा है। सवाल यह कि देश के सभी बच्चों को एक समान शिक्षा का अधिकार मिलना ही चाहिए। 1935 में जब भारत सरकार अधिनियम के तहत गठित राज्यों की सरकारों को जिन आठ विषयों पर शासन करने का अधिकार तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दिया था, उनमें से एक अधिकार शिक्षा व्यवस्था का भी संचालन था। गांधीजी को तब आने वाली चुनौतियों का पता था, इसीलिए उन्होंने डॉक्टर जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में राज्यों की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, इस पर विचार करने की जिम्मेदारी दी थी।

पिछले एक दशक में देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के तेज प्रयास देखने को मिले हैं। 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी प्रदान करने वाला 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009' (आरटीई एक्ट) सुधार के प्रयासों की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) बनाने की कवायद भी सुधार का अगला चरण हैं। हालांकि इससे पहले सन् 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में सन् 1986 में राजीव गांधी सरकार द्वार नई शिक्षा नीतियां लागू की गईं। वर्ष 1992 में इसमें कुछ छोटे-छोटे बदलाव भी