Inflation

मुझे नहीं लगता कि यह कहना अतिश्योक्ति होगा कि हमारा इतिहास, महंगाई और मुद्रा स्फीति का इतिहास रहा है। वह मुद्रा स्फीति जिसका सृजन आम तौर पर सरकार द्वारा सरकार के फायदे के लिए किया गया..
 
- फ्रैडरिक ऑगस्ट वॉन हायक  

पेट्रोल के मूल्यों में अप्रत्याशित वृद्धि से आम जनता का तिलमिलाना भी स्वाभाविक है और विपक्षी दलों का सरकार पर हमलावर होना भी, क्योंकि इस फैसले के पीछे पर्याप्त उचित आधार नहीं नजर आते। यह किसी आघात से कम नहीं कि पेट्रोल के मूल्यों में संभावित वृद्धि की खबरों के बीच पेट्रोलियम मंत्री यह कहकर देश को दिलासा देते हैं कि मुद्रास्फीति में तेजी के रुख को देखते हुए ऐसा करना मुश्किल होगा, लेकिन इस बयान की स्याही सूखने के साथ ही पेट्रोल महंगा हो जाता है। आम जनता इसलिए भी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है, क्योंकि सरकार का यह तर्क पूरी तरह सही नहीं कि तेल कंपनियों के घाटे के कारण पेट्रो

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जब अमेरिका और यूरोप मंदी से त्रस्त हैं और शेष दुनिया पर भी इसका कमोबेश असर दिखता है, तब रेशनल एक्सपेक्टेशंस थ्योरी के दो प्रणेताओं, क्रिस्टोफर ए सिम्स और थॉमस जे सार्जेंट को अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार देने की घोषणा का अर्थ है। हालांकि इन दोनों ने अलग-अलग काम किया है, लेकिन बीती सदी के साठ और सत्तर के दशक में किया गया इनका अध्ययन न सिर्फ एक दूसरे का पूरक है, बल्कि कई दशक पहले किए गए उनके अध्ययन की प्रासंगिकता आज कई गुनी बढ़ गई है।

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तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत में बृहस्पतिवार को एक बार फिर 3.14 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी कर दी. बढ़ी हुई दरें आधी रात से लागू हो गईं। इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी से दाम बढ़ाने  के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. जनवरी से अब तक पेट्रोल 8.47 रुपये प्रति लीटर महंगा हो चुका है. अब दिल्ली में पेट्रोल 66 रुपए 70 पैसे प्रति लीटर मिल रहा है। सरकार रसोई गैस यानी एलपीजी सिलिंडर के दाम भी बढ़ाने पर विचार कर रही है. तेल कंपनियों को डीजल, एलपीजी और केरोसिन पर प्रतिदिन 263 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. अभी प्रति सिलिंडर 267 रूपए की सब्सिडी मिलती है और एक सिलिंडर 395 रूपए में मिलता है. सरकार एलीपीजी पर सब्सिडी ख़त्म करना चाहती है.

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क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

प्राय: मुद्रास्फीति से निपटने के लिए सरकार फाइलें खोलती है और कुछ कागजी कार्रवाई करती है। इसके बाद कर्ज की उपलब्धता में कमी की जाती है, निर्यात पर रोक लगाई जाती है, आयात के नियमों में ढील दी जाती है और मल्टी-ब्रान्ड रीटेल के दरवाजे विदेशी निवेश के लिए खोलने की जरूरत को लेकर बहस शुरू हो जाती है। इस तरह के कदम उठाना व्यर्थ नहीं है, लेकिन ये ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए हैं।

इस देश में आम आदमी की बात तो छोड़िये, सपने देखने का हक शायद टाटा जैसे बड़े लोगों को भी नहीं है। सत्ता में बैठे मठाधीशों और अफसरों ने तय कर लिया है कि इंडिया में कोई भी सपना केवल वही देखेंगे और उसे पूरा करने का हक भी सिर्फ उन्हीं को है। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में 5 रुपए लीटर की बढ़ोत्तरी करके आम आदमी को फिर से साइकिल और दुपहिया वाहन पर ही चलने की ही हैसियत याद दिलाई है।

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काफी लंबे समय से महंगाई की मार से कराह रहा आमजन अब और किसी भी तरह के बोझ को ढोने के लायक नहीं बचा है। यही वजह है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव-नतीजों के बाद जैसे ही कंपनियों ने पेट्रोल के दाम बढ़ाए आवाम विरोध स्वरूप सड़कों पर उतर आई। नाराज लोगों ने जगह-जगह केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पुतले फूंके। इसे देखते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं कि पेट्रोल की कीमतों का निर्धारण कंपनियां करती हैं, सरकार नहीं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सरकार के खिलाफ एक्शन लेने की बजाय तेल कंपनियों को ऐसा कोई रास्ता सुझाया जाए जिससे दाम कम बढ़ें और घाटा भी कम हो।

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सरकार महंगाई पर काबू पाना चाहती है, इसलिए आरबीआइ ने ब्याज दर में वृद्धि की है. इसके पीछे यह सोच है कि ब्याज दर में वृद्धि के कारण कंपनियां कम कर्ज लेंगी और निवेश कम करेंगी. इससे बाजार में सीमेंट, स्टील और श्रम की मांग घटेगी. मांग घटने से महंगाई नियंत्रण में आयेगी. सरकार की इस पॉलिसी से महंगाई पर कुछ नियंत्रण अवश्य होगा, परंतु महंगाई की मूल समस्या का समाधान नहीं होगा. महंगाई का पहला कारण सरकारी खर्चे में वृद्धि है. पिछले दो वर्षो में वैश्विक मंदी से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए सरकार ने खर्चो में वृद्धि की थी. इससे महंगाई बढ़ रही है. अब इस वृद्धि को वापस लेने की जरूरत है.

प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तार काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए।

Author: 
गुरचरण दास

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