Quality of education

भारत में फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूलों को स्नेह और नापसंदगी दोनों समान रूप से प्राप्त है। बच्चों की शिक्षा के लिए एक तरफ तो ये स्कूल अभिभावकों के लिए काफी मूल्यवान हैं, वहीं दूसरी तरफ इन्हें या तो 'बच्चों के जीवन के साथ खेलने वाली शिक्षा की दुकानों (टीचिंग शॉप्स)' अथवा ऊंची फीस वसूलने वाले मुनाफाखोर संस्थाओं के तौर पर नापसंद भी किया जाता है। प्राइवेट स्कूलों की नैतिकता का प्रश्नचिन्ह होने के बावजूद देश में सभी प्रकार की प्राइवेट शिक्षा जैसे कि झुग्गी झोपड़ियों में चलने वाले प्राइवेट स्कूलों से लेकर कुलीन प्राइवेट स्कूलों के विस्तार के साथ एक

70000 वर्ष पूर्व शुरू हुई ‘संज्ञानात्मक क्रांति’ से मानव समाज की ‘ज्ञान यात्रा’ वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरती हुई आज के दौर में पहुँची हैं और शिक्षा इस लंबे मानव जीवन की सहचारिणी रही हैं। हालाँकि प्रारम्भ से ही शिक्षा ‘स्वतंत्र समाज’ का हिस्सा रही हैं लेकिन जबसे ‘राज्य-राष्ट्र’ के सिध्दान्त का उदय हुआ हैं; सभी देशों मे यह सरकारी व्यवस्था के एकाधिकार का शिकार बनकर रह गयी हैं। चूँकि किसी भी देश में उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही वहाँ के मानव संसाधन की गुणवत्ता निर्धारित करती हैं इसलिए शिक्षा

रिलायंस ने 1 सितंबर 2016 को अपनी दूरभाष सेवा ‘जियो’ का लोकार्पण किया। इसके तहत फोन पर निशुल्क बातचीत करने और ग्राहको के लिए 4 जी इंटरनेट डेटा प्लान उपलब्ध है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए आवश्यक रिलायंस जियो का सिम हासिल करने के लिए पूरा देश उमड़ पड़ा और कतारबद्ध होकर खड़ा हो गया।

ऐसा प्रतीत होता है कि आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी सरकारें यह नहीं समझ सकी हैं कि देश के नौनिहालों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए बच्चों को केवल स्कूल तक पहुंचा देने भर से ही काम नहीं बनेगा। तमाम सरकारी एवं गैरसरकारी आंकड़ें यह सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून, मिड डे मिल योजना, निशुल्क पुस्तकें, यूनिफार्म आदि योजनाओं के परिणामस्वरूप स्कूलों में दाखिला लेने वालों की संख्या तो बढ़ी हैं लेकिन छात्रों के सीखने का स्तर बेहद ही खराब रहा है। देश में भारी तादात में छात्र गणित, अंग्रेजी जैसे विषय ही नहीं, बल्कि सा

बजट 2017 पेश करने का समय सिर पर आ गया है और शिक्षा व्यवस्था का क्षेत्र ऐसे कुछेक क्षेत्रों में शामिल है जिन पर वित्त मंत्री को तुरंत ध्यान देना चाहिए। हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल तहस-नहस हो चुकी है और उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पा रही। हम जब तक इसे दुरुस्त नहीं करेंगे, तब तक अच्छे दिन लाने की सरकार के तमाम कोशिशें बेकार साबित होंगी।