sarva shiksha abhiyan

शिक्षा के क्षेत्र में हमें गुणवत्ता पर केन्द्रित रहना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दाखिला प्राप्त करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी सीखने के लक्ष्य की सबसे सीधी राह को पा सकें।

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लाकर बच्चों की पहुंच स्कूल तक तो हो गई लेकिन शिक्षा तक उनकी पहुंच अब भी नहीं हो पायी है। आरटीई में शिक्षा के लिए इनपुट के नॉर्म्स तो तय किए गए हैं लेकिन लर्निग आउटकम की बात नहीं की गई है। अध्यापकों की जो थोड़ी बहुत जवाबदेही सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) और नो डिटेंशन के प्रावधान के माध्यम से थी उसको भी हटाया जा रहा है। सीखने की सारी जिम्मेदारी व जवाबदेही बच्चों पर वापस डाली जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी अध्ययन भी यह बताते हैं कि बड़ी तादात में अध्यापक स्कूलों में गैरहाजिर रहते हैं। यदि स्कूल आते भी हैं तो कक्षाओं में नहीं जाते। इस गंभ

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निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) ही विद्यार्थियों की शिक्षा के राह का रोड़ा बन रहा है। आरोप है कि आरटीई के कुछ दोषपूर्ण उपनियमों के कारण देशभर के करीब एक लाख से अधिक छोटे स्कूल बंदी के कगार पर जा पहुंचे हैं। ऐसे स्कूलों की संख्या करीब 300 है, जो जमीन की अनिवार्यता के चलते 31 मार्च के बाद बंद हो जाएंगे। ऐसे में परेशान स्कूलप्रबंधक 24 फरवरी को जंतर-मंतर पर एकत्र होंगे। इस दौरान वे प्रधानमंत्री से स्कूलों की मान्यता के मामले में गुजरात मॉडल को देशभर मे लागू करने की मांग क