नई शिक्षा नीति

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक बार फिर से राष्ट्रीय शिक्षा नीति तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है। जून के अंतिम सप्ताह में इस संबंध में नौ सदस्यीय समिति का गठन कर दिया गया। जाने माने वैज्ञानिक व 1994 से 2003 तक इंडियन स्पेश रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के चेयरमैन रहे पद्मश्री व पद्म विभूषण के. कस्तूरीरंगन को समिति की अध्यक्षता सौंपी गई है। एसएनडीटी यूनिवर्सिटी, मुंबई की पूर्व कुलपति डा. वसुधा कामत, केरल के दो जिलों को सौ फीसदी साक्षर बनाने में महती भूमिका निभाने वाले पूर्व आईएएस अधिकारी के.जे.

किसी देश का भविष्य वहां के बच्चों को मिलने वाली प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करता है। प्रारम्भिक शिक्षा जिस प्रकार की होगी देश का भविष्य भी उसी प्रकार निर्धारित होगा। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति आजादी के बाद इतिहास में एक अहम कदम थी। उसका उद्देश्य राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाना तथा सामान्य नागरिकता व संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना था। 1968 की नीति लागू होने के बाद देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। 

वर्ष 2016 के अंत के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है। अतः मध्यावधि समीक्षा के लिये यह अच्छा समय है। मगर ऐसी किसी भी समीक्षा पर विमुद्रीकरण आघात से जुड़ी घटनाओं का प्रभुत्व तो रहेगा ही। इस एक अल्पावधि के घटनाचक्र को छोड़कर सरकार को अपने कार्यकाल के उत्तरार्ध में किस एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार पर जोर देना चाहिये? तो मैं यह कहूँगा कि यह हमारी विफल शिक्षा नीति है जिसमें सुधार की जरुरत है। आगे पूरा आलेख इसी बात की व्याख्या करेगा कि ऐसा क्यों जरुरी है?

आठवीं कक्षा तक छात्रों को फेल न करने की नीति को सैद्धांतिक मंजूरी पर विवाद शुरू हो गए हैं। जिन कारणों के चलते आठवीं तक छात्रों को फेल ना करने की नीति 1986 की नई शिक्षा नीति में स्वीकार की गई थी, उसमें सबसे प्रमुख कारण था स्कूलों से असमय ही बच्चों का पढ़ाई छोड़ देना। निश्चित तौर पर आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगी। लेकिन अब इस नीति को सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही सीमित करने के प्रावधान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारत जैसे देश में, जहां शिक्षा को मौलिक अधिकार में

आज देश में शिक्षा की दुर्दशा को लेकर दबी जुबान में बोलने का कोई फायदा नहीं है। दरअसल हालात बहुत बिगड़ गए हैं। दो टूक में कहें तो इसके लिए जिम्मेदार हैं स्कूल और शिक्षक जिनमें जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर छिटपुट प्रहार करने से काम नहीं बनेगा। लेकिन भारत में शिक्षा माफिया और इनकी लॉबी इतनी मजबूत है कि इसे आड़े हाथों लेना बहुत कठिन है और नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कर्णधार यह बखूबी जानते हैं और इससे इनकार भी नहीं कर सकते। ऐसे में शिक्षा क्षेत्र में जिम्मेदारी को लेकर जो आमूल परिवर्तन जरूरी हैउसके विरोध में मौजूदा श

- नौनिहालों के उज्जवल भविष्य के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म विकी पर शिक्षाविद, अध्यापक, अभिवावक, सिविल सोसायटी, स्कूल संचालक करा रहे हैं राय दर्ज
- शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सभी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सेक्टर्स की मांग को आवाज देने एक मंच पर आए सिविल सोसायटी संगठन

सहभागितापूर्ण लोकतंत्र के मूलमंत्र को आत्मसात करते हुए थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) ने शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न संगठनों को एक मंच के नीचे लाकर 'एनईपी गठबंधन' तैयार किया है। गठबंधन का उद्देश्य नई शिक्षा नीति के बाबत व्यापक विचार विमर्श करना है। इस उद्देश्य को अमली जामा पहनाते हुए एनईपी गठबंधन द्वारा ऑनलाइन विचारमंच (विकी) www.nep.ccs.in लांच किया गया है। इस विचारमंच पर कोई भी आम-ओ-खास शिक्षा और शिक्षा के बाबत बनने वाली नीतियों पर अपने विचार प्रकट कर सकता है। इस विचारमंच को तैयार करते

- 'एजुकेशनः फिलॉसफी, पॉलिसी एंड प्रैक्टिस' विषयक वर्कशॉप के दौरान शिक्षा के वर्तमान व भावी स्वरूप और नीतियों पर हुई गहन चर्चा
- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी और आजादी.मी ने मीडियाकर्मियों के लिए किया था दो दिवसीय वर्कशॉप का आयोजन

एक प्रावधान को लेकर 'शिक्षा का अधिकार' कानून एक बार पुन: चर्चा में है। इसबार बहस इसबात पर हो रही है कि आरटीई के आर्टिकल 30(1) में दिए गये 'नो डिटेंशन' नीति में बदलाव किया जाय अथवा नहीं! सबसे पहले तो यह समझते हैं कि आरटीई का आर्टिकल 30(1) क्या कहता है ?

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