right to education act

अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता और वेतन

शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 में शिक्षक होने के लिए बैचलर ऑफ एजुकेशन (बीएड) की योग्यता को अनिवार्य बना दिया गया है। इसके अतिरिक्त, पहले से ही अध्यापनरत समस्त अध्यापकों के लिए अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उतीर्ण करना भी अनिवार्य कर दिया गया है। राज्य सरकारों ने भी उक्त नियमों में रियायत नहीं दी और सभी निजी स्कूलों के अध्यापकों के लिए पांच वर्ष के भीतर टीईटी उतीर्ण करना आवश्यक कर दिया।

बीते दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 10वीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा को पुनः अनिवार्य बनाने पर अपनी सहमति दे दी। इसके साथ ही राज्यों को पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा कराने की भी दे दी गई। राजस्थान सहित कई राज्यों ने छठीं व आगे की कक्षा में परीक्षा कराने की गैर आधिकारिक घोषणा भी कर दी। 10वीं में बोर्ड की परीक्षा व छठीं तथा आगे की कक्षा में वार्षिक परीक्षा पद्धति वापस लाने के पीछे छात्रों द्वारा लापरवाही करने और पढ़ाई पर ध्यान न देने को प्रमुख वजह बताया गया है। इसे तर्कसंगत साबित करने के लिए राज्यों द्वारा तमाम सरकारी,

आज से ठीक पांच साल पहले १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून ८६वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाय। इस क़ानून के लागू होने के बाद शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की यह जवाबदेही तय हो गयी कि वो 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित कर सके। प्रथम दृष्टया जब इस  कानून और  इसके उद्देश्यों को देखते हैं तो बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने

राजधानी में यदि शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के तहत स्कूलों को मान्यता देने की व्यवस्था लागू की गई तो नए सत्र में करीब 1400 प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय बंद हो जाएंगे। शिक्षा का अधिकार कानून के नियम 18 व 19 के अंतर्गत स्कूलों को मान्यता प्रदान करने के नियमों का वर्णन है। इनमें छात्र शिक्षक अनुपात, कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या, खेल का मैदान आदि बातों का जिक्र है।

 

Category: