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छत्तीसगढ़  में 7 अक्टूबर को लैंडमाइन धमाके में माओवादी विद्रोहियों ने चार जवानों को मौत के घाट उतार दिया। फिर भी इस खबर ने लोगों का ध्यान नहीं खींचा। अखबारों में छोटी सी खबर छपी और अगले दिन गायब हो गई। इस खबर के साथ इतना तिरस्कारपूर्ण व्यवहार नहीं होता, अगर यह किसी जिहादी द्वारा किया गया आतंकी धमाका होता। भारतीय माओवाद को गंभीरता से नहीं लेते। इसको लेकर वे विभ्रम का शिकार है। माओवादी समस्या पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं होती है।

Author: 
गुरचरण दास

पेट्रोल के मूल्यों में अप्रत्याशित वृद्धि से आम जनता का तिलमिलाना भी स्वाभाविक है और विपक्षी दलों का सरकार पर हमलावर होना भी, क्योंकि इस फैसले के पीछे पर्याप्त उचित आधार नहीं नजर आते। यह किसी आघात से कम नहीं कि पेट्रोल के मूल्यों में संभावित वृद्धि की खबरों के बीच पेट्रोलियम मंत्री यह कहकर देश को दिलासा देते हैं कि मुद्रास्फीति में तेजी के रुख को देखते हुए ऐसा करना मुश्किल होगा, लेकिन इस बयान की स्याही सूखने के साथ ही पेट्रोल महंगा हो जाता है। आम जनता इसलिए भी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है, क्योंकि सरकार का यह तर्क पूरी तरह सही नहीं कि तेल कंपनियों के घाटे के कारण पेट्रो

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सरकार यदि उच्च शिक्षा क्षेत्र को नयी दिशा देने के लिए जल्द कोई कारगर कदम नहीं उठाती है तो किसी भी क्षेत्र में महाशक्ति बनने का सपना शायद कभी हकीकत में तब्दील नहीं हो पायेगा.
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था इन दिनों सुखिर्यो में है, पर नकारात्मक कारणों से. विश्व के 200 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सालाना सूची में भारत की एक भी यूनिवर्सिटी को जगह नहीं मिल पायी है. टाइम्स हाइयर एजुकेशन मैगजीन के इस सर्वे में शिखर पर हार्वर्ड, स्टैनफ़ोर्ड और ऑक्सफ़ोर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को रखा गया है.

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एलपीजी के कई मायने निकलते हैं। यह लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस भी हो सकता है और लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन एवं ग्लोबलाइजेशन (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) भी, जिसकी अक्सर वाम झुकाव वाले आलोचना करते हैं। इसका एक मतलब सरकार द्वारा आम लोगों की जिंदगी पर डाले गए डाके (लाइफ प्लंडर्ड बाइ गवर्नमेंट) से भी है, जो सरकारी हस्तक्षेप विरोधी भावनाओं से जुड़ा हुआ है। यह एहसास तथाकथित मध्यवर्ग में लगातार बढ़ रहा है। इसकी वजह पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतें व इनमें और वृद्धि का प्रस्ताव है।
असल में, पेट्रो उत्पादों में मूल्यवृद्धि जरूरी हो गई थी, क्योंकि वित्तीय सब्सिडी का बोझ बर्दाश्त से बाहर जाने लगा था। इसे सरकार तेल मार्केटिंग कंपनियों के घाटे की भरपाई के लिए दे रही थी, जो रुपये में कमजोरी के कारण और बढ़ गया। लेकिन यह कुतर्क है। दरअसल, अगर इसकी तुलना उस सार्वजनिक खर्च से की जाए, जिसे सरकार बेहिसाब लुटाती है, तो ये सब्सिडी ऊंट के मुंह में जीरे सी दिखेगी। इसे इस क्षेत्र में रोके गए निवेश का खास कारण नहीं माना जा सकता। ये निवेश कई अन्य वजहों से अटका है।

Author: 
बिबेक देबरॉय

अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद चुनाव सुधारों के बारे में चर्चा और गहमागहमी बढ़ गई है और अब सरकार ने कहा है कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार और चुनाव में सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प पर विचार करेगी। सभी प्रत्याशियों को नकारने के विकल्प को लागू करना तो अपेक्षाकृत आसान है। इस बात को लेकर काफी पहले से यह मांग उठ रही है कि अगर किसी मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है, तो उसे यह बात अपने वोट के जरिये कहने का अधिकार होना चाहिए, ताकि राजनैतिक दलों को यह पता चल सके कि भ्रष्ट और अपराधी चरित्र वाले उम्मीदवारों के खिलाफ कितने लोग हैं।

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उड़ीसा के कटक जिले के कोचिनाल गाँव में सोलर लैम्प की सुविधा आ जाने से लोगों में बहुत उत्साह है. सालों से बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं को तरसते यहाँ के ग्रामीण मिटटी के तेल वाले लैम्प का प्रयोग करते आ रहे थे. यहीं की रहने वाली सरिता बिसवाल इस वीडिओ में बता रही हैं कि केरोसीन लैम्प ग्रामीणों के लिए महंगा और असुविधाजनक साबित हो रहा था. तेज़ हवा और बरसात में भी ये लैम्प काम ना देता.

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खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर नीति-निर्माता अगर चाहें तो ताजा विश्व भूख सूचकांक रिपोर्ट को अपना संदर्भ बिंदु बना सकते हैं। 81 देशों की इस सूची में भारत 67वें नंबर पर आया है। यानी इस अध्ययन में शामिल सिर्फ 14 देशों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति भारत से बदतर है। यहां तक कि पाकिस्तान, नेपाल, रुआंडा और सूडान जैसे देश भी इस सूची में भारत से ऊपर आए हैं। यह सूचकांक अमेरिका स्थित संस्था इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट तैयार करती है।

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वर्ष 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमलों को रोकने में हमारी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी 2009 के आम चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन गई थी। आम चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि ‘हम देश के हर नागरिक को अधिकतम सुरक्षा की गारंटी देते हैं। हम आतंकवाद को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे, फिर उसका स्रोत चाहे कोई भी हो।’ घोषणा पत्र में यह भी कहा गया था कि ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पुलिस सुधारों की जरूरत को समझती और स्वीकार करती है। इसके लिए राजनीतिक एक्जीक्यूटिव और पुलिस प्रशासन के बीच स्पष्ट अंतर किया जाएगा। हाउसिंग और शैक्षिक सुविधाओं के मामले में पुलिस बल के लिए अधिक बेहतर प्रबंधन किया जाएगा। पुलिस बल की विश्वसनीयता को एक संस्थागत स्वरूप दिया जाएगा।’

जब अमेरिका और यूरोप मंदी से त्रस्त हैं और शेष दुनिया पर भी इसका कमोबेश असर दिखता है, तब रेशनल एक्सपेक्टेशंस थ्योरी के दो प्रणेताओं, क्रिस्टोफर ए सिम्स और थॉमस जे सार्जेंट को अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार देने की घोषणा का अर्थ है। हालांकि इन दोनों ने अलग-अलग काम किया है, लेकिन बीती सदी के साठ और सत्तर के दशक में किया गया इनका अध्ययन न सिर्फ एक दूसरे का पूरक है, बल्कि कई दशक पहले किए गए उनके अध्ययन की प्रासंगिकता आज कई गुनी बढ़ गई है।

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केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का एक बड़ा अनुरोध ठुकराए जाने के बाद नंदन नीलेकणी के निर्देशन में काम कर रहा भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) लगातार सवालों के घेरे में आ गया है। एक सवाल यह उठाया जा रहा है कि यूआईडीएआई उन कई वित्तीय निगरानी और नियंत्रणों से बाहर है जो किसी भी सरकार के कामों में लागू होते हैं। हो सकता है ऐसा इसलिए हो क्योंकि इसकी समूची व्यवस्था को सावधानीपूर्वक कुछ इस तरह तैयार किया गया है  कि वह न्यूनतम परेशानियों और कष्टकारी प्रक्रियाओं के साथ काम कर सके।

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