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सरकार द्वारा बहु-ब्रांड खुदरा में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के खिलाफ बीते हफ्ते पांच करोड़ दुकानदारों और व्यापारियों ने बंद का आह्वान किया। असलियत में यह साबित करता है कि छोटे व्यापारियों का वह दावा कितना खोखला है, जिसमें वे खुद को असंगठित क्षेत्र का कमजोर प्रतिनिधि बताते हैं। हड़ताल पर गए पांच करोड़ ये व्यापारी देश के समूचे संगठित क्षेत्र के कामगारों (3 करोड़) से कहीं अधिक हैं। दुकानदारों को असंगठित या गरीब बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। जहां मैं रहता हूं, वहां के स्थानीय बाजार में छोटी सी भी दुकान करोड़ रुपये की है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को दी गई अनुमति देर से उठाया गया एक सही कदम है। पिछले दस वर्षो से यह उम्मीद की जा रही थी कि सरकार खुदरा क्षेत्र में भी उदारीकरण की नीतियों को लागू करे, क्योंकि दूसरे देशों की तुलना में हमारा रिटेल सेक्टर काफी पिछड़ा हुआ और असंगठित था। अब जबकि औद्योगिक विकास दर धीमी पड़ रही है और महंगाई पर नियंत्रण पाना मुश्किल हो रहा है तो नए रोजगारों के सृजन की संभावना धीमी पड़ रही थी।

भारत में भ्रष्टाचार का बढ़ना न केवल एक बड़ी चिंता की बात, बल्कि एक ऎसा पक्ष है, जिस पर ज्यादातर भारतीयों को शर्म का अहसास हो रहा है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि भारत में पारदर्शिता और कम हो गई है। भारत वर्ष 2007 में 72वें स्थान पर था, लेकिन अब घटती पारदर्शिता की वजह से 95वें स्थान पर आ गया है।

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यदि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी देने के फैसले के जरिये सरकार उस बनती धारणा को समाप्त करना चाह रही थी कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दूसरे कार्यकाल में नीतिगत स्तर पर लकवाग्रस्त स्थिति है, तो सरकार मकसद में बुरी तरह नाकाम हुई। इसके बजाय संप्रग के नाराज सहयोगी दल आरोप लगा रहे हैं कि उनसे परामर्श नहीं किया गया, सत्तारूढ़ कांग्रेस में भी विरोधाभास के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं और एकजुट विपक्ष संसद के भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर सरकार को कमजोर करने पर आमादा है।

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असमानता को लेकर हमें अपना नजरिया साफ करने और पाखंड से दूर रहने की जरूरत है।  गरीबी एक निरपेक्ष धारणा है, जबकि असमानता सापेक्ष। गरीबी को घटाना वांछनीय है। लेकिन असमानता में कमी लाना एक स्वयंसिद्ध उद्देश्य नहीं है। ऐसी धारणा है कि बढ़ती असमानता, चाहे वह असल हो या काल्पनिक, बुरी होती है।

बीते साल शंकर आचार्य और राकेश मोहन ने मोंटेक सिंह अहलूवालिया के सम्मान में एक पुस्तक का संपादन किया था। इस किताब में स्वर्गीय सुरेश तेंदुलकर का असमानता पर एक लेख था। इस लेख में बैंकाक में हुए एक सम्मेलन के बेहद रोचक किस्से का जिक्र था। उस वक्त मनमोहन सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष हुआ करते थे।

Author: 
बिबेक देबरॉय

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम कोई नेता नहीं हैं कि वे किसी पार्टी या सरकार के पक्ष में बोलेंगे। उन्होंने कूडनकुलम के परमाणु-संयंत्र के पक्ष में अपनी राय देकर सारे विवाद का पटाक्षेप कर दिया है। उस संयंत्र के विरूद्ध जो लोग प्रदर्शन कर रहे थे, उनमें से यद्यपि कई संदेहास्पद चरित्र के लोग भी थे लेकिन उस क्षेत्र के लोगों की चिंता स्वाभाविक ही थी। चेर्नोबिल और फुकुशिमा की दिल दहला देनेवाली दुर्घटनाओं ने सारे संसार को परमाणु-ऊर्जा के बारे में पुनर्विचार के लिए बाध्य कर दिया था। ऐसी स्थिति में हमारी सरकार भी हतप्रभ हो रही थी। उसकी जुबान हकला रही थी। इसी कारण 13 हजार करोड़ रू.

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नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाले देश के प्रमुख औद्योगिक घराने टाटा ग्रुप से एक वर्ष के अंदर बदलाव की दूसरी बड़ी खबर आयी है 43 वर्षीय युवा सायरस मिस्त्री की डिप्टी चेयरमैन के पद पर नियुक्ति के रूप में. रतन टाटा द्वारा अध्यक्ष पद छोड़ने और कंपनी की कमान युवा हाथों में देने की 2010 में की गयी पहल के बाद से ही इस पर बहस छिड़ गयी थी. नये अध्यक्ष के चयन के लिए बनी पांच विशेषज्ञों की समिति द्वारा देश-विदेश के सैकड़ों लोगों के साक्षात्कार के बाद अंतिम रूप से सायरस मिस्त्री के नाम पर सहमति बनी.

Author: 
गुरचरण दास

राजस्थान के करौली जिले में सड़क चौड़ा करने के नाम पर, सरकार ने इंदिरा आवास योजना के तहत गरीबों को मुहय्या कराये गए घर ही तोड़ दिए. इस वीडिओ में सुनीता कसेरा बता रहीं हैं कि पंचायत समिति के दफ्तर तक मार्ग सुलभ करने के लिए सरकार ने रास्ते में पड़ने वाली सड़क को चौड़ा करने का फैसला किया. पर इस बारें किसी को भी पूर्व में सूचना नहीं दी गयी

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कई सालों से भारतीय रेलवे को विश्व मानकों के अनुरूप ढालने का दम भरा जा रहा है। सुरक्षा संबंधी दावे भी बढ़-चढ़ कर किए जाते हैं। मगर हकीकत यह है कि आए दिन देश के किसी न किसी हिस्से में गाड़ियों की आपसी टक्कर, उनके पटरी से उतरने, आग लगने आदि घटनाएं हो जाती हैं। पिछले साढ़े सात महीनों में करीब इक्यासी रेल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें तीन सौ से ऊपर लोगों को जान गंवानी पड़ी है। हावड़ा-देहरादून एक्सप्रेस में लगी आग इस सिलसिले की ताजा कड़ी है। इसमें सात लोग मारे गए। यह घटना रात के समय हुई, जब सारे मुसाफिर गहरी नींद में थे।

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पिछले लगभग एक साल के अंतराल में देश में हुए दो बड़े खेल आयोजनों में भारत की दो अलग-अलग तस्वीरें नजर आईं। गत वर्ष अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन पुराने भारत के नेता-बाबू गठबंधन द्वारा किया गया था। फॉर्मूला वन ग्रांप्री का आयोजन नए भारत द्वारा स्थानीय निजी उद्यमियों और वैश्विक व्यवसाय के सहर्ष संयोग से किया गया।

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन के बारे में आम धारणा है कि उसने देश की छवि पर बट्टा लगाया। दूसरी तरफ फॉर्मूला वन के आयोजन को इस तरह देखा जा रहा है कि उसने वैश्विक जाजम पर इंडिया इंकॉपरेरेशन के पदार्पण की पुष्टि कर दी है। तो क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि राजनेताओं और नौकरशाहों वाले पुराने भारत पर कॉपरेरेट और शो-बिज पॉवर वाले नए भारत ने बढ़त बना ली है?

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