bazaar

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक संस्था अपने आप में अत्यंत नैतिक होती है, और

व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नही है। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नही होता होगा।