RTE

आज अगर किसी से भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात की जाय तो सब यही कहेंगे कि शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, एक बाजार बन गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है अगर इस बात में सच्चाई होती तो क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इतनी दुर्दशा होती? इतनी खामियां और नाकामियां होती?

आजादी के पूर्व से ही देश में शिक्षा के प्रचार प्रसार में बजट प्राइवेट स्कूल्स अर्थात लो फी प्राइवेट स्कूल्स का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। समय समय पर इन स्कूलों से निकली विभूतियों ने व्यापार, खेल, राजनीति सहित तमाम क्षेत्रों में अपने झंडे गाड़े हैं। अफोर्डिब्लिटी और क्वालिटी एजुकेशन के कारण ही आज बजट प्राइवेट स्कूल्स सरकारी स्कूलों के विकल्प के रूप में उभरे हैं। न केवल नौकरी पेशा मध्यम वर्ग बल्कि मेहनत मजदूरी करने वाला निम्न आय वर्ग भी अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए बीपीएस का रूख कर रहे हैं। इस बात की तस्दीक समय समय पर सरकारी और गैर

अगर सवाल उठाया जाय कि 'स्कूल' क्यों ? तो सीधा जवाब मिलेगा, शिक्षा प्रदान करने के लिए। लेकिन वर्तमान स्थिति इस सीधे जवाब से उलट है। वर्तमान में स्कूल शिक्षा देने की बजाय सरकारी कानूनों का पालन करने अथवा न पालन कर पाने की स्थिति से निपटने में अपनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार क़ानून' चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। लेकिन आज इस क़ानून के कई प्रावधान ही बच्चों की शिक्षा में आड़े आ रहे हैं। मसलन, आरटीई का बिल्डिंग कोड अथवा लैंड नार्म्स।

- शिक्षा का अधिकार कानून ही बन रहा शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा
- आरटीई के दोषपूर्ण उपनियमों के कारण 1 लाख से अधिक स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा, 2 करोड़ से  ज्यादा छात्रों का भविष्य दाव पर

आज से ठीक पांच साल पहले १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून ८६वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाय। इस क़ानून के लागू होने के बाद शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की यह जवाबदेही तय हो गयी कि वो 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित कर सके। प्रथम दृष्टया जब इस  कानून और  इसके उद्देश्यों को देखते हैं तो बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने

शिक्षा का अधिकार क़ानून-२००९ लागू होने के बाद यह उम्मीद जताई गयी कि यह क़ानून प्राथमिक स्तर पर देश के गरीब से गरीब बच्चे की शिक्षा को सुनिश्चित करेगा। लेकिन अपने पेंचीदा प्रावधानों की वजह से आज यह क़ानून ही सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है। इससे पहले की हम शिक्षा के अधिकार क़ानून की खामियों पर बात करें, हमे इस बात पर गौर करना होगा कि कोई भी क़ानून लाने का उद्देश्य क्या होता है?

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) ही विद्यार्थियों की शिक्षा के राह का रोड़ा बन रहा है। आरोप है कि आरटीई के कुछ दोषपूर्ण उपनियमों के कारण देशभर के करीब एक लाख से अधिक छोटे स्कूल बंदी के कगार पर जा पहुंचे हैं। ऐसे स्कूलों की संख्या करीब 300 है, जो जमीन की अनिवार्यता के चलते 31 मार्च के बाद बंद हो जाएंगे। ऐसे में परेशान स्कूलप्रबंधक 24 फरवरी को जंतर-मंतर पर एकत्र होंगे। इस दौरान वे प्रधानमंत्री से स्कूलों की मान्यता के मामले में गुजरात मॉडल को देशभर मे लागू करने की मांग क

रायपुर. शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) की मदद से ज्यादातर बच्चों को सरकारी स्कूलों में लाने की योजना फेल साबित हुई है। स्कूल शिक्षा विभाग ने पिछले साल दाखिले की प्रक्रिया बदली थी। इसके तहत पहले सरकारी स्कूलों में फिर अनुदान प्राप्त व आखिर में प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिया जाना था।

Pages