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वर्ष 2016 के अंत के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है। अतः मध्यावधि समीक्षा के लिये यह अच्छा समय है। मगर ऐसी किसी भी समीक्षा पर विमुद्रीकरण आघात से जुड़ी घटनाओं का प्रभुत्व तो रहेगा ही। इस एक अल्पावधि के घटनाचक्र को छोड़कर सरकार को अपने कार्यकाल के उत्तरार्ध में किस एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार पर जोर देना चाहिये? तो मैं यह कहूँगा कि यह हमारी विफल शिक्षा नीति है जिसमें सुधार की जरुरत है। आगे पूरा आलेख इसी बात की व्याख्या करेगा कि ऐसा क्यों जरुरी है?

सरकारी जमीन पर बने प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस बढ़ाने के एक मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सरकार की अनुमति को आवश्यक बताया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूली फीस एक बड़ा मुद्दा है; सामाजिक मुद्दा भी और राजनैतिक मुद्दा भी। एक तरफ स्कूल प्रबंधन अपने खर्चे का हवाला देते हुए फीस वृद्धि को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश करता है वहीं अभिभावक और उनके साथ साथ सरकार इसे स्कूलों की मनमानी बताती है। अभिभावक चाहते हैं कि स्कूली फीस के मामले में सरकार दखल दे और स्कूलों की मनमानी से उन्हें निजात दिलाए। शिक्षा के क्षेत्र मे

शिक्षा के क्षेत्र में हमें गुणवत्ता पर केन्द्रित रहना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दाखिला प्राप्त करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी सीखने के लक्ष्य की सबसे सीधी राह को पा सकें।

बजट 2017 पेश करने का समय सिर पर आ गया है और शिक्षा व्यवस्था का क्षेत्र ऐसे कुछेक क्षेत्रों में शामिल है जिन पर वित्त मंत्री को तुरंत ध्यान देना चाहिए। हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल तहस-नहस हो चुकी है और उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पा रही। हम जब तक इसे दुरुस्त नहीं करेंगे, तब तक अच्छे दिन लाने की सरकार के तमाम कोशिशें बेकार साबित होंगी। 

70000 वर्ष पूर्व शुरू हुई ‘संज्ञानात्मक क्रांति’ से मानव समाज की ‘ज्ञान यात्रा’ वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरती हुई आज के दौर में पहुँची हैं और शिक्षा इस लंबे मानव जीवन की सहचारिणी रही हैं। हालाँकि प्रारम्भ से ही शिक्षा ‘स्वतंत्र समाज’ का हिस्सा रही हैं लेकिन जबसे ‘राज्य-राष्ट्र’ के सिध्दान्त का उदय हुआ हैं; सभी देशों मे यह सरकारी व्यवस्था के एकाधिकार का शिकार बनकर रह गयी हैं। चूँकि किसी भी देश में उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही वहाँ के मानव संसाधन की गुणवत्ता निर्धारित करती हैं इसलिए

विकास की मंजिल पाने की मुख्य राह शिक्षा दिखाएगी। तरक्की में शिक्षा अहम है। यह जुमला विद्वानों की सभा से लेकर, गोष्ठिïयों, संगोष्ठियों में खूब सुनाई देगा। मगर उज्जवल भविष्य की नींव कहलाने वाली शिक्षा, आम जन की पहुंच से उतनी दूर और मुश्किल हो रही है, जैसे मंगल पर पानी की खोज। चुनावी बिसात पर बैठे नेताओं ने अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को आरटीई के सांचें में ढाला। मगर यहां भी बढ़ती मुनाफाखोरी ने अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को कुचलता हुआ आगे निकल गया। स्कूलों के गेट पर सुबह ६ बजे से बच्चों के एडमिशन के लिए लगी अभिभावकों की लंबी कतारों से जाहिर होता ह

आठवीं कक्षा तक छात्रों को फेल न करने की नीति को सैद्धांतिक मंजूरी पर विवाद शुरू हो गए हैं। जिन कारणों के चलते आठवीं तक छात्रों को फेल ना करने की नीति 1986 की नई शिक्षा नीति में स्वीकार की गई थी, उसमें सबसे प्रमुख कारण था स्कूलों से असमय ही बच्चों का पढ़ाई छोड़ देना। निश्चित तौर पर आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगी। लेकिन अब इस नीति को सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही सीमित करने के प्रावधान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारत जैसे देश में, जहां शिक्षा को मौलिक अधिकार में

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट 2009) आने और वर्ष 2010 से लागू होने के 7 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन इतनी बड़ी समयावधि बीत जाने के बाद भी तमाम समस्याएं अब भी बरकरार हैं। एक तरफ स्कूल आरटीई के प्रावधानों को अव्यवहारिक बताकर इसकी मुखालफत कर रहे हैं वहीं सरकार हर हाल में उन प्रावधानों को लागू कराना चाहती है। तय समय सीमा के भीतर प्रावधानों के लागू न किए जाने की दशा में स्कूलों पर तगड़े जुर्माने और उन्हें बंद करने का नियम है। गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आरटीई कानून आने के बाद स

इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी क्षेत्र में, चाहें वो सेवा का क्षेत्र हो अथवा उत्पादन का, जबतक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाली स्थिति नहीं होती है तबतक गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों का अभाव बना रहता है। प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ गुणवत्ता और पारदर्शिता के लिए मूल्यांकन का होना नितांत आवश्यक है। आज जब प्रश्न शिक्षा में गुणवत्ता का उठता है तो बहस को सरकारी बनाम निजी स्कूल की तरफ मोड़ देने का चलन है। यह मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली स्थिति भर है। सवाल यह कभी नहीं होना चाहिए कि शिक्षा सरकारी हो या प्राइवेट?

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लाकर बच्चों की पहुंच स्कूल तक तो हो गई लेकिन शिक्षा तक उनकी पहुंच अब भी नहीं हो पायी है। आरटीई में शिक्षा के लिए इनपुट के नॉर्म्स तो तय किए गए हैं लेकिन लर्निग आउटकम की बात नहीं की गई है। अध्यापकों की जो थोड़ी बहुत जवाबदेही सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) और नो डिटेंशन के प्रावधान के माध्यम से थी उसको भी हटाया जा रहा है। सीखने की सारी जिम्मेदारी व जवाबदेही बच्चों पर वापस डाली जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी अध्ययन भी यह बताते हैं कि बड़ी तादात में अध्यापक स्कूलों में गैरहाजिर रहते हैं। यदि स्कूल आते भी हैं तो कक्षाओं में नहीं जाते। इस गंभ

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