Education

आज देश में शिक्षा की दुर्दशा को लेकर दबी जुबान में बोलने का कोई फायदा नहीं है। दरअसल हालात बहुत बिगड़ गए हैं। दो टूक में कहें तो इसके लिए जिम्मेदार हैं स्कूल और शिक्षक जिनमें जिम्मेदारी का सर्वथा अभाव रहा है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर छिटपुट प्रहार करने से काम नहीं बनेगा। लेकिन भारत में शिक्षा माफिया और इनकी लॉबी इतनी मजबूत है कि इसे आड़े हाथों लेना बहुत कठिन है और नई शिक्षा नीति (एनईपी) के कर्णधार यह बखूबी जानते हैं और इससे इनकार भी नहीं कर सकते। ऐसे में शिक्षा क्षेत्र में जिम्मेदारी को लेकर जो आमूल परिवर्तन जरूरी हैउसके विरोध में मौजूदा श

-  द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतिस्पर्धा ‘एडू-डॉक’ की हुई औपचारिक घोषणा, प्रविष्ठियां भेजने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर
- 3 दिसंबर को प्रतिष्ठित ‘स्कूल च्वाइस नेशनल कांफ्रेंस’ के दौरान इंडिया हैबिटेट सेंटर में होगी स्क्रीनिंग, 3 श्रेष्ठ फिल्में होंगी पुरस्कृत

भारत में शिक्षा के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। शिक्षा उपकर से लेकर न जाने क्या-क्या? पर हकीकत ये है कि सरकार जो पैसे खर्च करती हैं, उसका भारी दुरुपयोग होता है। क्यों न शिक्षा के लिए आवंटित पैसे सीधे-सीधे छात्रों को वाउचर के रूप में दे दिया जाए - पेश है इस पर एक पड़ताल।

रायपुर. शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) की मदद से ज्यादातर बच्चों को सरकारी स्कूलों में लाने की योजना फेल साबित हुई है। स्कूल शिक्षा विभाग ने पिछले साल दाखिले की प्रक्रिया बदली थी। इसके तहत पहले सरकारी स्कूलों में फिर अनुदान प्राप्त व आखिर में प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिया जाना था।

इस वर्ष फरवरी में मुझे राष्ट्रपति भवन में आयोजित कुलपतियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इस बहस का उद्‌देश्य भी अच्छा था और इसे बहुत ही अच्छी तरह संचालित किया गया था। देश के शीर्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों के करीब सौ कुलपति सम्मेलन में मौजूद थे। इन्हें कई उप-समूहों में बांटकर देश में शिक्षा क्षेत्र के सामने उपस्थित ज्वलंत विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। हालांकि, सम्मेलन का स्वरूप थोड़ा औपचारिक था, लेकिन जिन विचारों पर चर्चा हुई वे सारे ज्वलंत व प्रासंगिक थे।
 
- शिक्षा, सुरक्षा और असंगत कर प्रणाली के कारण ब्रिटेन सहित अन्य देशों में पलायन करने को मजबूर हो रहे लोग
 
- प्रतिदिन 12 लोग छोड़ रहे हैं देश, सबसे ज्यादा पलायन वाले देशों में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान
 
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की विद्यार्थियों के प्रति अरुचि और कक्षाओं से नदारद रहने के मामले सामने आते रहते हैं। इस व्यवस्था में बदलाव के लिए जरूरी है कि न सिर्फ मानिटरिंग सिस्टम बेहतर हो बल्कि शिक्षकों को उनके प्रदर्शन पर आधारित प्रोत्साहन दिया जाए। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी (सीसीएस) की ओर से दिल्ली के सरकारी, निजी व बजट स्कूलों को ध्यान में रखकर हुई रिसर्च में सामने आया है कि किस तरह से सरकारी स्कूलों की हालत खराब हो रही है और निजी स्कूलों की साख मजबूत हो रही है।
 

वह एक जाने माने अर्थशास्त्री हैं, लेकिन अमेरिका के सांटा क्लारा यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर लॉ पढ़ाते हैं। उन्होंने स्वयं किसी विश्वविद्यालय से लॉ और इकोनॉमिक्स की डिग्री हासिल नहीं की है बल्कि हावर्ड से फिजिक्स और केमेस्ट्री की पढ़ाई की है। हालांकि इकोनॉमिक्स और लॉ पर उन्होनें कई किताबें लिखी हैं जो कि दुनियाभर के इकोनॉमिस्ट्स और लॉ एक्सपर्ट्स के बीच काफी लोकप्रिय है। हम बात कर रहे हैं स्वयं को अनार्किस्ट-अनाक्रोनिस्ट इकोनॉमिस्ट कहलाना पसंद करने वाले प्रो.

Pages