Education

निजी स्कूलोँ को उनके क्लासरूम के आकार के हिसाब से जज करने के बजाए उनके रिजल्ट के आधार पर क्योँ नही जज किया जा सकता है? हमारे लिए लाइब्रेरी के साइज के बारे में जानने के बजाए यह जानना जरूरी क्योँ नही हो सकता है कि बच्चोँ में पढ़ने का कौशल कितना है? हमारे लिए यह तय करना जरूरी क्योँ है कि एक गणित के अध्यापक की योग्यता क्या है, जबकि यह जानना जरूरी है कि उसके छात्र गणित में कितने कुशल हो रहे हैं?

कल्पना कीजिए कि आप ऐसे आदर्शवादी युवा हैं, जिसमें भावी पीढ़ी के बच्चों को प्रेरित करने की महत्वाकांक्षा है। इसलिए आप स्कूल खोलते हैं। आप अपने जैसे ही प्रेरक शिक्षक जुटाते हैं। स्कूल तत्काल सफल हो जाता है और उसे छात्रों, पालकों और समाज का सम्मान प्राप्त होता है। फिर 2010 में एक नया कानून (राइट टू एजुकेशन एक्ट) आता है। इसमें सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों में वेतन की समानता की बात है। आप अपने शिक्षकों का वेतन दोगुना कर 25 हजार प्रतिमाह करने पर मजबूर होते हैं। यहां तक कि श्रेष्ठतम निजी स्कूल जैसे दून स्कूल और मेयो को भी वेतन बढ़ाने पड़ते हैं। क

70000 वर्ष पूर्व शुरू हुई ‘संज्ञानात्मक क्रांति’ से मानव समाज की ‘ज्ञान यात्रा’ वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरती हुई आज के दौर में पहुँची हैं और शिक्षा इस लंबे मानव जीवन की सहचारिणी रही हैं। हालाँकि प्रारम्भ से ही शिक्षा ‘स्वतंत्र समाज’ का हिस्सा रही हैं लेकिन जबसे ‘राज्य-राष्ट्र’ के सिध्दान्त का उदय हुआ हैं; सभी देशों मे यह सरकारी व्यवस्था के एकाधिकार का शिकार बनकर रह गयी हैं। चूँकि किसी भी देश में उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही वहाँ के मानव संसाधन की गुणवत्ता निर्धारित करती हैं इसलिए शिक्षा

रिलायंस ने 1 सितंबर 2016 को अपनी दूरभाष सेवा ‘जियो’ का लोकार्पण किया। इसके तहत फोन पर निशुल्क बातचीत करने और ग्राहको के लिए 4 जी इंटरनेट डेटा प्लान उपलब्ध है। इस योजना का लाभ उठाने के लिए आवश्यक रिलायंस जियो का सिम हासिल करने के लिए पूरा देश उमड़ पड़ा और कतारबद्ध होकर खड़ा हो गया।

निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी और उस पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की तरफ से की जा रही कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है। बेशक निजी स्कूलों को मनमाने ढंग से फीस में बढ़ोत्तरी को अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन फीस बढ़ोतरी नियंत्रित कैसे हो इसके तरीके अलग अलग हो सकते  हैं। निजी स्कूलों के फीस नियंत्रण पर चर्चा करने से पहले एक अहम सवाल यह है कि छठवें और सातवें वेतन आयोग के बाद अध्यापकों के वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या उसी अनुपात में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है?

किसी देश का भविष्य वहां के बच्चों को मिलने वाली प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करता है। प्रारम्भिक शिक्षा जिस प्रकार की होगी देश का भविष्य भी उसी प्रकार निर्धारित होगा। 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति आजादी के बाद इतिहास में एक अहम कदम थी। उसका उद्देश्य राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाना तथा सामान्य नागरिकता व संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना था। 1968 की नीति लागू होने के बाद देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार भी हुआ। 

शिक्षा के क्षेत्र में हमें गुणवत्ता पर केन्द्रित रहना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दाखिला प्राप्त करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी सीखने के लक्ष्य की सबसे सीधी राह को पा सकें।

विकास की मंजिल पाने की मुख्य राह शिक्षा दिखाएगी। तरक्की में शिक्षा अहम है। यह जुमला विद्वानों की सभा से लेकर, गोष्ठिïयों, संगोष्ठियों में खूब सुनाई देगा। मगर उज्जवल भविष्य की नींव कहलाने वाली शिक्षा, आम जन की पहुंच से उतनी दूर और मुश्किल हो रही है, जैसे मंगल पर पानी की खोज। चुनावी बिसात पर बैठे नेताओं ने अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा को आरटीई के सांचें में ढाला। मगर यहां भी बढ़ती मुनाफाखोरी ने अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को कुचलता हुआ आगे निकल गया। स्कूलों के गेट पर सुबह ६ बजे से बच्चों के एडमिशन के लिए लगी अभिभावकों की लंबी कतारों से जाहिर होता ह

निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई एक्ट 2009) आने और वर्ष 2010 से लागू होने के 7 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन इतनी बड़ी समयावधि बीत जाने के बाद भी तमाम समस्याएं अब भी बरकरार हैं। एक तरफ स्कूल आरटीई के प्रावधानों को अव्यवहारिक बताकर इसकी मुखालफत कर रहे हैं वहीं सरकार हर हाल में उन प्रावधानों को लागू कराना चाहती है। तय समय सीमा के भीतर प्रावधानों के लागू न किए जाने की दशा में स्कूलों पर तगड़े जुर्माने और उन्हें बंद करने का नियम है। गैर आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक आरटीई कानून आने के बाद स

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