Livelihood

कहने को तो हिंदूस्तान एक देश होने के नाते एक यूनिफाइड मार्केट है लेकिन किसानों के लिए सरकार जब चाहे तब एक नई लक्ष्मण रेखा खींच देती है। किसानों को अपनी ही फसल अपने मनपसंद ग्राहक को बेचने की आजादी नहीं रही है। देश के किसी अन्य प्रांत में तो क्या किसानों को अपना उगाया अनाज अपने तहसील या लोकल मंडी में भी प्राइवेट ट्रेडर्स को देने में कड़ी मनाहियां रहीं हैं। कुछ किलो अनाज को भी अपने साथ दूसरे राज्य में ले जाने पर स्मगलिंग जैसे संगीन मामले आरोपित कर किसानों को 30 दिन तक सलाखों के पीछे धकेला जाता रहा है। प्रस्तुत वीडियो डाक्यूमेंट्री में किसानों की आपबीती उन्हीं की जुबानी सुनें

विश्‍व में भारत ऐसा देश है, जहां पर बांस सबसे ज्‍यादा पाया जाता है। मगर वन विभाग कानून के तहत इसे पेड़ की कैटेगरी में दर्ज किया गया है, यही कारण है कि इसकी गैरकानूनी ढंग से कटाई पर भारत में रोक है, लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि बांस कोई पेड़ नहीं है, बल्‍कि यह घास की ही एक प्रजाति का वंशज है।

राजस्थान के छोटे से गांव का राजुराम । बड़ी मुश्किल से अपनी पढाई पूरी की और बीएड करने के लिए जब पेसो का बंदोबस्त नहीं हुआ तो बुढे पिता ने अपना खेत बेच कर पेसो का इंतजाम किया । इस आस में कि सरकारी नोकरी लग जायेगी तो परिवार को दो जून की रोटी नसीब हो जायेगी । लेकिन बदकिस्मती से खूब कोशिस करने के बावजूद भी नोकरी नहीं मिल पाई । तब तक विवाह भी हो गया और दो लडकिया और एक लड़का भी हो गया ।
 
- 'चार' और 'पद्मिनी माय लव' को सर्वश्रेष्ठ डॉक्युमेंट्री अवार्ड, तिची गोश्ता व सिल्वर गांधी को भी मिली सराहना
- विजेता डॉक्यूमेंट्री निर्माताओं का काठमांडू में होगा सम्मान
 

यूपीए-1 की विशेषता उसका सोशल एजेंडा था। यह सकारात्मक संकेत है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरते जाने और भटकाव का शिकार दिखने के बाद अपनी दूसरी पारी में मनमोहन सिंह सरकार फिर उस एजेंडे की तरफ लौट रही है।

लंबे टालमटोल के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक अब कानून बनने के रास्ते पर है। खास बात यह है कि अधिकारप्राप्त मंत्री समूह ने जिस विधेयक को मंजूरी दी है, वह कमोवेश राष्ट्रीय सलाहकार समिति (एनएसी) द्वारा तैयार किए गए प्रारूप पर आधारित है।

एक तरफ करोड़ों रु. खर्च कर सरकार विभिन्न रोजगार योजनाएँ चला रही है। जबकि दूसरी ओर ऐसे कई कानून हैं, जो आम आदमी को ईमानदारी से कमाने से रोकती हैं। रिक्शा चलाने वालों से संबंधित कानून इसका जीता जागता उदाहरण है।

दिल्ली में रिक्शा चलाना सरल नहीं है। दिल्ली नगर निगम साइकिल रिक्शा बायलॉज के प्रावधानों तथा सड़क जाम के मद्देनजर रिक्शा चलाने वालों पर तमाम बंदिशें लादी गयीं हैं। जैसे रिक्शा चलाने के लिए लाइसेंस अनिवार्य है। रिक्शा का मालिक ही रिक्शा चालक हो सकता है। एक व्यक्ति एक से अधिक रिक्शा नहीं रख सकता। अर्थात् किराये का रिक्शा चलाना अवैध है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने बांस को पेड़ नहीं, घास की संज्ञा दे दी है. इस आधिकारिक पुष्टि के साथ ही लम्बे समय से बांस को घास घोषित किये जाने के लिए चल रहे अभियान को राहत मिली है. इस आधिकारिक पुष्टि से जंगलो में रहने वाले आदिवासियों के अधिकार भी स्थापित हो सकेंगे.

बांस के घास घोषित होने के साथ ही उम्मीद है कि हमारे जंगलों का नुकसान कुछ कम होगा और देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार मिल सकेगा. साथ ही साथ देश के आदिवासियों को अपने जंगलों और उन से मिलने वाले फायदों पर बेहतर इख्तियार मिल सकेगा.

अनेक वर्षों से कई सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा दलित समस्याओं को लेकर देश में जगह-जगह चर्चाएं-परिचर्चाएं की जाती रही हैं. सवाल उठाया जाता रहा है कि आखिर कब तक दलित पूरी तरह से आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहतर होगा और वह भी समाज में उसी तरह सम्मान के साथ निडर होकर जी सकेगा जैसे समाज के अगड़े जी रहे हैं. ऐसे सवाल भी उठाये जा रहे हैं जो दलितों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की गयी योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न आने को लेकर हैं.

हमारे देश में एक अद्भुत घटना घट रही है। तीन करोड़ गरीब महिलाओं ने छोटा-मोटा कारोबार शुरू करने के लिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ऋण लिए हैं।

Author: 
गुरचरण दास

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