प्रीतीश नंदी

कुछ दिनों पहले खबर थी कि केंद्र सरकार ने बजट में 2.80 लाख कर्मचारियों की भर्ती का प्रावधान किया है। यह प्रधानमंत्री के इस वादे के खिलाफ है कि उनके नेतृत्व में कम सरकार, अधिक शासन मूल मंत्र रहेगा। मैंने भोलेपन में इसका यह अर्थ लगाया कि यह मेरी, आपकी और आम नागरिकों की जिंदगी को अधिक आसान बना देगा, जो नियमों की भूल-भुलैया में से राह निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिछले दशकों में अधिकांश भारत को चलाने वाली सुस्त और विशाल नौकरशाही में पर्किंसन्स लॉ (नौकरशाही की अनियंत्रित वृद्धि) के साथ नियम-कानून भी खरगोशों की तरह तेजी से बढ़ते चले गए।

आज के तकनीकी विशेषज्ञों की सबसे अच्छी बात यह है कि वे हमारी कुछ सबसे पुरानी समस्याए सुलझा रहे हैं। ऐसी समस्याएं, जो कोई कभी सुलझाना ही नहीं चाहता था, क्योंकि मुनाफा यथास्थिति में ही था, इसलिए कोई नहीं चाहता था कि ये दूर हों। हर कोई इससे पैसे कमा रहा था। फिर तकनीक के विशेषज्ञ आए और उन्होंने सारा खेल बिगाड़ दिया। आइए कुछ उदाहरण देखते हैं :
 
आखिरकार कोई तो बुद्धिमानी से बोला। अब तक तो हमने काले धन को लेकर हर किसी को आक्रोश व्यक्त करते हुए ही देखा, लेकिन किसी ने व्यावहारिक समाधान नहीं सुझाया। बोफोर्स घोटाले से इसकी शुरुआत हुई थी और उसके कारण राजीव सरकार को सत्ता से बेदखल होना पड़ा। फिर तो हर किसी को यह समझ में आ गया कि काला धन राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की प्रतिष्ठा को खत्म करने का एकदम कारगर उपाय है। काले धन को लेकर शेखी बघारी जानेे लगी। एनडीए सरकार तो एक कदम आगे जाकर काले धन पर लगाम लगाने के लिए सच में काले कानून ही ले आई।