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अपनी युवावस्था के दिनों में मैंने निचले स्तर तक आर्थिक लाभ के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक ट्रिकल डाउन) के बारे में सुना था। इसके मुताबिक अगर अमीर और अधिक अमीर होंगे तो गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा और इस वजह से यह सबके लिए फायदेमंद रहेगा। ऐसा माना जा रहा था कि यह इस बात का भी खुलासा कर देगा, कार्ल मार्क्स के विपरीत, कि यह सच नहीं है कि अमीर और अमीर हो गए, जबकि गरीब और गरीब। इसके विपरीत हुआ यह कि दोनों ही साथ-साथ अमीर हुए। अमेरिका में गरीबी की रेखा 11 हजार डॉलर प्रति वर्ष (पांच लाख रुपए प्रति वर्ष) की चौंकाने वाली ऊंचाई तक पहुंच गई है। इतिहास

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि सभी मनुष्य तार्किक होते हैं अर्थात् वे हानि की अपेक्षा लाभ पसन्द करते हैं तथा तार्किक रूप से स्व-हित के लिए प्रयासरत रहते हैं। राजनीति विज्ञान में अधिकाँशतः गलत रुप से यह माना जाता है कि राजनैतिक बाज़ार के सभी अभिनेता अर्थात् राजनेता एवं नौकरशाह, निस्वार्थ भाव से जनहित के लिए प्रयासरत रहते हैं।

यह अच्छा है कि वर्तमान मोदी सरकार विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए अपने पूर्ववर्ती सरकारों की भांति भावुकता की बजाए व्यावहारिकता के आधार पर फैसले लेती दिख रही है। वित्तमंत्री अरुण जेटली के राज्यसभा में दिया गया वह बयान जिसमें कि उन्होंने घाटे में चल रही 79 सार्वजनिक इकाईयों को निजी करने के विकल्प को खुला रखने की बात कही थी, इसका ज्वलंत प्रमाण है। स्थिति की गंभीरता को और अधिक स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि यदि सिर्फ उक्त 79 इकाईयों में लगे निवेश की धनराशि को ही वसूल लिया जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक को 1,30,000 रुपए प्राप्त हो सकते

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।