फेल

70000 वर्ष पूर्व शुरू हुई ‘संज्ञानात्मक क्रांति’ से मानव समाज की ‘ज्ञान यात्रा’ वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरती हुई आज के दौर में पहुँची हैं और शिक्षा इस लंबे मानव जीवन की सहचारिणी रही हैं। हालाँकि प्रारम्भ से ही शिक्षा ‘स्वतंत्र समाज’ का हिस्सा रही हैं लेकिन जबसे ‘राज्य-राष्ट्र’ के सिध्दान्त का उदय हुआ हैं; सभी देशों मे यह सरकारी व्यवस्था के एकाधिकार का शिकार बनकर रह गयी हैं। चूँकि किसी भी देश में उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही वहाँ के मानव संसाधन की गुणवत्ता निर्धारित करती हैं इसलिए शिक्षा

आठवीं कक्षा तक छात्रों को फेल न करने की नीति को सैद्धांतिक मंजूरी पर विवाद शुरू हो गए हैं। जिन कारणों के चलते आठवीं तक छात्रों को फेल ना करने की नीति 1986 की नई शिक्षा नीति में स्वीकार की गई थी, उसमें सबसे प्रमुख कारण था स्कूलों से असमय ही बच्चों का पढ़ाई छोड़ देना। निश्चित तौर पर आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगी। लेकिन अब इस नीति को सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही सीमित करने के प्रावधान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारत जैसे देश में, जहां शिक्षा को मौलिक अधिकार में

एक प्रावधान को लेकर 'शिक्षा का अधिकार' कानून एक बार पुन: चर्चा में है। इसबार बहस इसबात पर हो रही है कि आरटीई के आर्टिकल 30(1) में दिए गये 'नो डिटेंशन' नीति में बदलाव किया जाय अथवा नहीं! सबसे पहले तो यह समझते हैं कि आरटीई का आर्टिकल 30(1) क्या कहता है ?

शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आठवीं कक्षा तक के बच्चों को फेल नहीं किया जा सकता है. ऐसे में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हालत इतनी खराब है कि जब वही बच्चे नौवीं कक्षा में पहुंचते हैं, तो उनमें से 50 फीसदी फेल हो जाते हैंः आजतक