Air India

ब्रिटिश एयरवेज और लुफ्तहांसा। एयरलाइंस की दुनिया में चमकते ऐसे नाम हैं जिनके विमानों में हर शख्स एक ना एक बार यात्रा जरूर करना चाहता है। इनकी बेहतरीन सर्विस और शानदार मेहमाननवाजी का हर कोई कायल है लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था। 1987 में ब्रिटेन की सरकारी एयरलाइंस ब्रिटिश एयरवेज में घाटा जब लगातार बढ़ता गया और कंपनी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई तो वहां की सरकार ने एविएशन सेक्टर से निकलने का फैसला कर लिया। कुछ ऐसा ही 1994 में जर्मनी की लुफ्तहांसा के साथ हुआ। भारी घाटे और कर्ज के बोझ से लुफ्तहांसा दब चुकी थी। जर्मन सरकार ने समय रहते उसे निजी

इस वर्ष फरवरी में मुझे राष्ट्रपति भवन में आयोजित कुलपतियों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इस बहस का उद्‌देश्य भी अच्छा था और इसे बहुत ही अच्छी तरह संचालित किया गया था। देश के शीर्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों के करीब सौ कुलपति सम्मेलन में मौजूद थे। इन्हें कई उप-समूहों में बांटकर देश में शिक्षा क्षेत्र के सामने उपस्थित ज्वलंत विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। हालांकि, सम्मेलन का स्वरूप थोड़ा औपचारिक था, लेकिन जिन विचारों पर चर्चा हुई वे सारे ज्वलंत व प्रासंगिक थे।
 

देश का राष्ट्रीय वायुवाहक एयर इंडिया संकट में है। पिछले चार वषों में सरकार ने कंपनी को 16,000 करोड़ रुपये की रकम उपलब्ध कराई है। यह रकम 500 रुपये प्रति परिवार बैठती है। इसका मतलब यह हुआ कि देश के हर परिवार से यह रकम वसूल कर एयर इंडिया को उपलब्ध कराई गई है। इतनी बड़ी राशि झोंकने के बाद भी कंपनी का घाटा थम नहीं रहा है।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने कुछ दिन पूर्व एक विशेष रिपोर्ट जारी की है| इस रिपोर्ट में उसने इंडियन एयरलाइंस के 111 नए विमानों के सौदे की फजीहत कर दी है| ये सौदा काफी साल खींचा गया  और अब कैग ने उस पर अपनी नज़रे तिरछी की हैं|

इस रिपोर्ट में एयर इंडिया एवं इंडियन एयरलाइन्स के विलय के मुद्दे सहित कई और मुद्दे जैसे सौदे में खरीदे जाने वाली विमानों की संख्या, इसमें लग रहा लम्बा समय, क़र्ज़ लेकर विमान खरीदने के निर्णयों की आलोचना की गयी है| मुख्यतः इस रिपोर्ट में इस पूरे सौदे में हुई हेराफेरी की खूब खिंचाई की गयी है|

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