R K Amin

आर.के. अमीन की पुस्तक “मनी, मार्केट और मार्केटवाला” का पहला अध्याय है “बिना हस्तक्षेप मुद्रा या मुक्त बैकिंग” (Laissez-faire money or free banking)। यह पुस्तक पूंजीवाद, मुक्त बैंकिंग और बी.आर. शिनॉय तथा एफ.ए. हायक के जीवन और योगदान पर प्रकाश डालती है। इस अध्याय में विशेष रूप से इस मुद्दे को उठाया गया है कि किस तरह से अर्थव्यवस्था में पूंजी की आपूर्ति की जा सकती है। इस में सवाल उठाया गया हैः अगर मुक्त बाजार के जरिये उपभोक्ताओं के हित की अन्य वस्तुएं मुहैया कराई जाती हैं तो फिर धन की आपूर्ति बाजार द्वारा क्यों नहीं की जाती है? अगर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विनियमन (deregulation) पर मुख्य जोर है तो आखिर क्यों ऐसा बैंकिंग और फाइनेंस, मुख्य रूप से धन के प्रावधान में नहीं किया जाता है?

यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि अगर मुक्त बाजार से सामान की आपूर्ति से उपभोक्ता का भला होता है तो फिर मुद्रा की आपूर्ति भी क्यों न बाजार के ही हाथ में सौंप दी जाए? अर्थशास्त्र के अन्य क्षेत्रों में जब विनियमन (deregulation) हटाने पर ही जोर दिया जाता है तो फिर बैंकिंग और वित्त (फाइनेंस), खासतौर पर मुद्रा की आपूर्ति में क्यों नहीं?