law

भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में से एक है जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य सुशासन के लिए काम करना होता है। वह सुशासन जो प्रमुख रूप से आठ अव्यवों से मिलकर
तैयार होता है। ये अव्यव हैंः
विधि का शासन अर्थात rule of law
समानता एवं समावेशन अर्थात equity and inclusiveness
भागीदारी अर्थात participation
अनुक्रियता अर्थात responsiveness
बहुमत या मतैक्यता अर्थात consensus oriented
प्रभावशीलता व दक्षता अर्थात effectiveness and efficiency
पारदर्शिता अर्थात transparency

भारतीय कानूनी व्यवस्था अब भी कई मामलों में दकियानूसी है। देश में अब भी सैकड़ों कानून हैं, जिनकी उपयोगिता खत्म हो गई है। लेकिन अब भी वे लागू हैं। यह और बात है कि कानून लागू करने वाली संस्थाएं इनका खुद भी इस्तेमाल नहीं करतीं। लेकिन अगर चाहें तो वे इन कानूनों के जरिए आम लोगों को परेशान कर सकती हैं। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो  इसे उनका एहसान ही माना जाना चाहिए, एक ऐसा एहसान जो कभी भी बंद किया जा सकता है। पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने करीब 11 सौ से अधिक ऐसे अप्रासंगिक और गैरजरूरी कानूनों को हटा दिया है। लेकिन अब भी देश में सैकड़ों कानून ऐ

आज से ठीक पांच साल पहले १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून ८६वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाय। इस क़ानून के लागू होने के बाद शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की यह जवाबदेही तय हो गयी कि वो 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित कर सके। प्रथम दृष्टया जब इस  कानून और  इसके उद्देश्यों को देखते हैं तो बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने

भारत में न्याय मिलने में विलंब के लिए कई प्रक्रियागत खामियां जिम्मेदार हैं। न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए कुछ कदम उठाए जाने चाहिए।