आर्थिक सुधार

बजट 2017 पेश करने का समय सिर पर आ गया है और शिक्षा व्यवस्था का क्षेत्र ऐसे कुछेक क्षेत्रों में शामिल है जिन पर वित्त मंत्री को तुरंत ध्यान देना चाहिए। हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल तहस-नहस हो चुकी है और उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं दे पा रही। हम जब तक इसे दुरुस्त नहीं करेंगे, तब तक अच्छे दिन लाने की सरकार के तमाम कोशिशें बेकार साबित होंगी। 

प्राचीन काल से ही भारत व्यापार एवं व्यवसाय को प्राथमिक स्तर की वरीयता देने वाला देश रहा है। चाणक्य की अर्थनीति में भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा में भी अर्थ को प्रथम वरीयता पर रखा गया है। ऋग्वेद में भारत को कृषि एवं पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मध्य-युगीन भारतीय इतिहास को देखें तो वहां भी भारत की स्थिति व्यापार एवं व्यवसाय के अनुकूल नजर आती है। चूँकि इस दौरान अरब व्यापारियों का भारत में व्यापार के लिए आगमन हो चुका था और यूरोप के लोग भी समुद्री मार्ग से भारत आने का रास्ता खोजने लगे थे। ईस्ट इंडिया कंपनी भ

यदि किसी असाधारण उत्प्रेरक की संभावना को छोड़ दें तो मई महीने में शेयर बाजार में अक्सर सुस्ती देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए पिछले साल बड़े बड़े रिफार्म का वादा कर सत्ता के करीब पहुंच रही मोदी सरकार से बाजार ने बड़ी उम्मीदें लगाई थीं। परिणाम स्वरुप शेयर बाजार में जबरदस्त उछाल देखने को मिला था। किंतु सरकार के कार्यकाल के एक साल पूरा होने को है लेकिन अबतक कोई बड़ा रिफार्म धरातल पर उतरता दिखाई नहीं दे रहा है। इसके अलावा घरेलू स्तर पर मानसून ही एक ट्रिगर होता है जो बाजार को सांत्वना देता है। लेकिन अल नीनो इफेक्ट के कारण इस वर्ष मानसून के औसत से

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।