आदिवासी

केंद्रीय पर्यावरण और वन  मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के मसौदे में प्रदूषक भुगतान करें,लागत न्यूनतम हो,और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए बाजार पर आधारित प्रोत्साहनों पर बल दिया गया है। इसकी एक तार्किक परिणिती यह होनी चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की स्वामित्व या प्रबंधन का जिम्मा उन समुदायों को सौंपा जाए जो उन पर निर्भर हैं। लेकिन उस मामले में यह नीति कम पड़ती है।यह कमी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में ज्यादातर सामूहिक प्राकृतिक संसाधन मुक्त संसाधनों में बदल चुकें हैं।

वाघ बनाम आदिवासी – अनुसूचित जनजाति (वन अधिकार मान्यता) बिल 2005 पर बहस को इसी रूप में पेश किया जा रहा है। आप अगर वाघ के पक्ष में हैं तो आपको आदिवासियों के वन अधिकार को मान्यता नहीं देनी चाहिए। और यदि आप आदिवासियों के पक्ष में हैं तो इसका मतलब यह है कि वाघ आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। यह पूरीतरह से झूठी दुविधा है।

बांस के पेड़ की बजाए घास होने के तथ्य के वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित और संवैधानिक तौर पर स्वीकृत हो जाने के बावजूद नौकरशाही और पहले से जारी व्यवस्था के कारण अब तक इसे घास के रूप वैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। जिसके कारण इसकी कटाई और व्यवसायिक प्रयोग की मनाही है। यदि इसे घास के रूप में पर्यावरण और वन मंत्रालय से वैधानिक मान्यता मिल जाती है तो देश में न केवल हरे वृक्षों की कटाई में कमी आएगी बल्कि इसके सहारे आजिविका कमाने वाले लाखों आदिवासियों व जंगल पर निर्भर जनजातियों को व्यवसाय भी उपलब्ध हो सकेगा। यहां तक कि स्वयं योजना आयोग का भी मानना है कि इससे 5 करोड़ लोगों के रोजगार

पिछले वर्ष केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम  था । अब नईं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने भी बांस के दस हजार करोड़ के व्यापार को पर नौकरशाही के एकाधिकार को खत्म करने के लिए उनके कई एतराजों को खारिज कर उन्होंने बांस को  लघु वन उपज घोषित कर दिया है। इससे आदिवासियों को बांस उगाने और बेचने की अनुमति मिल जाएगी। यदि जयंती नटराजन का फैसला सचमुच जमीनी स्तरपर लागू हो सका तो इससे करोड़ों आदिवासियों के जीव

एक साल पहले तकरीबन इन्हीं दिनों में राहुल गांधी ने ओडिशा में कुछ आदिवासियों से कहा था कि वे दिल्ली में उनकी लड़ाई लड़ेंगे। नियमगिरि के डोंगरिया कोंड आदिवासी बिसार दिए गए और अब राहुल का फोकस यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर नोएडा के जाट किसानों व अन्य समूहों की ओर हो गया है।

राहुल गांधी का यह व्यवहार समूचे राजनीतिक वर्ग के चरित्र को प्रदर्शित करता है। देश की आजादी के बाद संविधान द्वारा चिह्न्ति ऐसे दो समूहों में आदिवासी भी एक थे, जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। इसी वजह से संसद में व सरकारी नौकरियों में दलितों के अलावा आदिवासियों के लिए भी सीटें आरक्षित की गईं।